वाट्सएप पर बिगड़ती बच्चों की भाषा!

 बड़े शहरों की तर्ज पर चूरू जिले के भी अनेक बच्चे और टीनेजर सोशल मीडिया पर तेजी से चैटिंग करने के लिए अपने खुद की भाषा (स्लैंग) काम ले रहे हैं

By: शंकर शर्मा

Published: 16 Apr 2016, 11:45 PM IST

चूरू. बड़े शहरों की तर्ज पर चूरू जिले के भी अनेक बच्चे और टीनेजर सोशल मीडिया पर तेजी से चैटिंग करने के लिए अपने खुद की भाषा (स्लैंग) काम ले रहे हैं। धीरे-धीरे यह भाषा उनकी दिनचर्या में शामिल हो रही है।जानकारों की मानें तो स्लैंग के चलते बच्चों की भाषा पर विपरीत असर पडऩे लगा है।

स्लैंग के जरिए बच्चों की हिन्दी और अंगे्रजी दोनों खराब हो रही है।डीएनडी, एचआरडब्ल्यू, एचबीडी और आईडीके, एलटीसी, एलओएल, ऐसे अनेक शब्द हैं जो बच्चे काम ले रहे हैं।बड़ों के भले ही यह समझ आए या नहीं,लेकिन बच्चे समझ जाएंगे, डएनडी मतलब डू नॉट डिस्टर्ब, एचआरडब्ल्यू का हाउ आर यू, एचबीडी का हैप्पी बर्थ डे, एलटीसी का लव एंड टेक केयर, एलओएल का लॉफ आउट लाउड और आईडीके का आई डोंट नो, होता है।यह भाषा बच्चे आसानी से समझ रहे हैं।फेसबुक, वॉट््सएप, हाइक, याहू मैसेंजर, जैसे सोशल मीडिया पर बच्चे और टीनेजर कुछ इसी तरह अपने दोस्तों से बात करने लगे हैं। अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी अब बहुत से बच्चे ऐसे शब्द काम में ले रहे हैं।

फिल्मों और टीवी से भी खीखते हैं
जानकारों के अनुसार कई फिल्मों और सीरियल्स में भी ऐसी भाषा का उपयोग होता है। इनके जरिए भी बच्चे स्लैंग सीखते हैं। मसलन, बिंदास, झक्कास, भिखारी, साइको, कबाड़ी आदि शब्द फिल्मों और सीरियल्स में काफी इस्तेमाल होते हैं। मौजूदा दौर में बन रहे रैप सॉन्ग्स भी बच्चों की भाषा बिगाड़ रहे हैं।

 राजकीय जालान महाविद्यालय रतनगढ ़(चूरू) के समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ सुशील त्यागी के अनुसार कम उम्र में बच्चों पर इन शब्दों का ज्यादा असर होता है। अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों को समय कम दे पा रहे हैं,यह गलत है। इसके गलत परिणाम सामने आ सकते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को समय जरूर दें।फिल्मी व गाने वाले चैनलों के बजाय बच्चों को ज्ञान व जानकारी देने वाले चैनल देखने के लिए प्रेरित करें। इसके अलावा बच्चों को आउटडोर खेलों के लिए भी उत्साहित करें।

मिलती हैं ऐसी भी कॉपियां
निजी स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि स्लैंग का प्रभाव बच्चों में अब इतना होने लगा है कि कुछ विद्यार्थी परीक्षा की कॉपी में भी ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं। जिसका बाद में उनको खमियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसे शब्दों के चलते बच्चों की वोकैब्लरी, स्पेलिंग, वाक्य बनाने खराब हो रहे हैं।यहां तक कि कई बच्चों को शब्दों के मायने भी समझ नहीं आते हैं, जिसके चलते उनकी वार्तालाप खराब हो रही है। साथ ही आत्मविश्वास भी कम हो रहा है।
शंकर शर्मा
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