कहां पर चार सौ साल में एक भी दूल्हा नहीं बैठा घोड़ी पर.. और क्यों

सरदारशहर (चूरू). शादी में घोड़ी पर नहीं बैठकर बारात के साथ पैदल चले सुनने में जरूर आपकों कुछ अटपटा लग रहा होगा, लेकिन यह बात सही है। तहसील क्षेत्र में पूलासर गांव में दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता, बारात के साथ पैदल चलता है। पिछले चार सौ साल से परम्परा चली आ रही है। घोड़ी पर बैठने पर की कोई पाबंदी नहीं है।बुजुर्ग बताते है कि आज तक किसी भी दूल्हे को घोड़ी पर बैठे हुए नहीं देखा है।

By: Vijay

Published: 01 Mar 2020, 10:41 PM IST

सरदारशहर (चूरू). शादी में घोड़ी पर नहीं बैठकर बारात के साथ पैदल चले सुनने में जरूर आपकों कुछ अटपटा लग रहा होगा, लेकिन यह बात सही है। तहसील क्षेत्र में पूलासर गांव में दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता, बारात के साथ पैदल चलता है। पिछले चार सौ साल से परम्परा चली आ रही है। घोड़ी पर बैठने पर की कोई पाबंदी नहीं है।बुजुर्ग बताते है कि आज तक किसी भी दूल्हे को घोड़ी पर बैठे हुए नहीं देखा है। सालों से चली आ रही परम्परा को निभा रहे हैं।ग्रामीणों ने बताया कि आज से 6 75 साल पहले इस गांव को पुलाराम सारण नामक एक व्यक्ति ने बसाया था। बड़े गांवों में से एक पूलासर गांव में ज्यादातर परिवार व्यापार करते हैं। गांव में आधी से ज्यादा आबादी पारीक ब्राह्मण जाति की है। इसके अलावा सभी जाति के लोग निवास करते है। किसी भी जाति को दुल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता। करीब 400 साल पहले उगाराम नाम का व्यक्ति था। उसी व्यक्ति से गांव में दूल्हे को घोड़ी पर नहीं बैठने की परंपरा जुडी हुई है। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि पूलासर गांव पहले स्वतंत्र गांव था लेकिन बीकानेर के तत्कालीन राजा ने पूलासर गांव से कर मांगा। ग्रामीणों ने यह कहकर कर देने से मना कर दिया कि यह पूरा गांव ब्राह्मणों का है, जो पूजा पाठ करके अपना जीवन यापन करते हैं लेकिन राजा नहीं माना और बीकानेर से अपनी सेना लेकर गांव पर चढ़ाई कर दी। इस पर उगाराम घोड़ी पर बैठ कर राजा के सामने ही चला गया। सवाई छोटी गांव में राजा से आमना सामना हो गया।

कर के तौर पर काट कर दिया शीश
उगाराम ने तत्कालीन राजा से गांव से कर नहीं लेने की गुजारिश की, लेकिन राजा नहीं माना। अंत में उगाराम ने अपना शीश काटकर कर के रूप में राजा को दिया। तभी से ग्रामीणों की उगाराम में आस्था जुड़ गई । सरदारशहर से पूर्व दिशा में 9 किलोमीटर दूर पूलासर है वहीं दक्षिण दिशा में 5 किलोमीटर पर छोटी सवाई गांव बसा है। इन दोनों गांवो के बीच महज 15 किलोमीटर की दुरी है। लोगों ने बताया कि उगाराम ने घोड़ी पर बैठकर सवाई छोटी गांव गए वहां पर अपना शीश काटकर देने की घटना के बाद में गांव में घोड़ी पर नहीं बैठने की परम्परा शुरू हो गई। इस घटना के बाद पूलासर गांव के लोग आज भी छोटी सवाई गांव का पानी तक नही पीते है।
घोड़ी पर नहीं बैठने का रिसर्च किया
गांव के प्रोफेसर डॉ.ओपी बोहरा ने बताया कि मेने पूलासर गांव की घोड़ी पर नहीं बैठने के पीछे काफी रिसर्च किया। इसमे ग्रामीणों से बातचीत करने में यह तथ्य सामने आया की पूलासर गांव में बीकानेर रियासत का पहले कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ करता था। लेकिन आज से लगभग 400 साल पहले वहां बीकानेर रियासत के कुछ प्रतिनिधि कर लेने के लिए पूलासर की ओर से कूच किया। जिसको लेकर उगाराम पांडिया ने घोड़ी पर चढ़कर उन राजा के सिपाहियों का सामना करने पहुंचे। गांव सवाई छोटी के पास उगाराम ने राजा के सिपाहियों के सामने कर के रूप में अपना शीश काट कर दे दिया। गांव में घोड़ी उगाराम रखते थे। उनके सम्मान में किसी ने आज तक घोड़े पर नहीं बैठे हैं इसीलिए यह परंपरा तभी से चली आ रही है।
दादोजी महाराज का गांव में है भव्य मंदिर
कर के रूप में अपने शीश का दान करने के बाद उगाराम को लोक देवता के रूप में मानने लगे, जो दादोजी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए। जिनका गांव के बीचोबीच भव्य मंदिर है। मन्दिर की खास बात ये है कि इस मन्दिर में कोई मूर्ति या फोटो नही है, यहाँ के लोग दादोजी महाराज की चरण पादुकाओं को पूजते है।

Vijay Desk/Reporting
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