सब स्टेशन के लिए 150 पेड़ों की बलि

शहर के नवावूर स्थित अन्ना विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय परिसर में तमिलनाडु विद्युत बोर्ड ने सब-स्टेशन निर्माण के लिए लगभग 150 पेडों को काट डाला।इसकी जानकारी छात्रों और पर्यावरण प्रेमियों को मिली तो उन्होंने विरोध किया और काम रुकवा दिया। विश्वविद्यालय के सूत्रों ने बताया कि बिजली बोर्डके कर्मचारी मजदूरों को साथ में ले कर आए थे।

By: brajesh tiwari

Published: 16 May 2020, 02:29 PM IST

कोयम्बत्तूर. शहर के नवावूर स्थित अन्ना विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय परिसर में तमिलनाडु विद्युत बोर्ड ने सब-स्टेशन निर्माण के लिए लगभग 150 पेडों को काट डाला।इसकी जानकारी छात्रों और पर्यावरण प्रेमियों को मिली तो उन्होंने विरोध किया और काम रुकवा दिया। विश्वविद्यालय के सूत्रों ने बताया कि बिजली बोर्डके कर्मचारी मजदूरों को साथ में ले कर आए थे। परिसर में वे ये कहते हुए घुसे कि निर्माण के लिए जमीन की माप -जोख करने आए हैं।

छात्रों और पर्यावरण प्रेमियों में रोष
10 से 15 मिनट में उन्होंने बिजली की आरी जैसी मशीनों से 154 पेड़ काट डाले। इसकी खबर मिलने पर छात्रों में रोष फैल गया।हालांकि लॉकडाउन की वजह से अधिकांश छात्र अपने गृहनगरों में हैं। बोर्ड की कारगुजारी की भनक लगने पर स्थानीय छात्र परिसर में आ गए। उन्होंने रोकने की कोशिशकी। इसी दौरान कुछ छात्रों ने मोबाइल से पेड़ों को काटने का वीडियो बना लिया। जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। विश्वविद्यालय के अधिकारी भी मौके पर आ गए और उन्होंने काम को रुकवा दिया। इस बीच शहर के पर्यावरण प्रेमियों ने पूरे घटनाक्रम पर अफसोस जताया है। उनका कहना है कि जब सरकारी उपक्रम ही पेड़ों को काटने में लगे है तो फिर आम जनता से क्या उम्मीद की जाए।

हरित पट्टी के रुप में लगाए थे पेड़
एक पर्यावरण प्रेमी ने बताया कि परिसर में हरित पट्टी विकसित करने के लिए पेड़ लगाए गए थे। पेड़ करीब पांच सा ल से भी बढ़े थे। सरकार को यदि विद्युत सब स्टेशन ही बनाना था तो वह ऐसी जगह तलाश कर सकती थी जहां पेड़ काटने की नौबत नहीं आती। क्योंकि काटे गए पेड़ों को दूबारा जिन्दा नहीं किया जा सकता। तीन साल पहले खरीदी जमीन पर नहीं थे पेड़ पूरे घटनाक्रम के बारे में बिजली बोर्डके एक अधिकारी ने बताया कि सब स्टेशन का काम लम्बे अर्से से बंद था। अब क्षेत्र में निर्बाध बिजली की आपूर्ति के लिए सब स्टेशन बनाना जरूरी हो गया था। तीन साल पहले हमने उप-स्टेशन निर्माण के लिए परिसर में एक एकड़ भूमि का भुगतान किया था। जब हमने जमीन खरीदी थी , तो वहां कोई पेड़ नहीं थे। जमीन खरीदने के बाद एक एनजीओ ने वहां पेड़ लगाए थे। विश्वविद्यालय को एनजीओं को बताना चाहिए था कि यह जमीन बिजली बोर्ड की है। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हमने तीन साल पहले की दरों के आधार पर वर्क ऑर्डर दे दिए हैं। अगर हम अब स्थान बदलते, तो परियोजना की लागत बढ़ जाती। दूसरी जगह जमीन आवंटन की कोशिश विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि हमें किसी वरिष्ठ अधिकारी से काम के बारे में कोई आदेश नहीं मिला है। इस मुद्दे को हल कर रहे हैं। हम बिजली बोर्ड और जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ बातचीत करेंगे । कोशिश करेंगे कि उन्हें बिना पेड़ों वाली जमीन दे दी जाए।

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