दुखों का मूल कारण है कर्म

jain muni vijairatnsen surishwer pravachan आचार्य विजयरत्नसेन सूरीश्वर ने रविवार को कहा कि दुखों का मूल कारण कर्म है। पानी से भरे समुद्र की तरह संसार भी कर्मों से भरा है और कर्मों के कारण चारों गतियों में मात्र दुख की ही बहुलता है।

By: Dilip

Published: 01 Jul 2019, 02:05 PM IST

कोयम्बत्तूर. आचार्य विजयरत्नसेन सूरीश्वर vijairatn surishwer रविवार को कहा कि दुखों का मूल कारण कर्म है। पानी से भरे समुद्र की तरह संसार भी कर्मों से भरा है और कर्मों के कारण चारों गतियों में मात्र दुख की ही बहुलता है।
राजस्थान जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ rajasthan jain shwetamber murtipujak sangh के फतेह हॉल में धर्मसभा dharm sabha को संबोधित करते हुए आचार्य ने कहा कि आत्मत्व की अपेक्षा से संसार में आ रही आत्मा और मोक्ष में गई आत्माओं में कोई भेद नहीं है। फिर भी संसार में रही आत्माओं को चार गतियों में दुख सहन करने पड़ते हैं और मोक्ष में गई आत्माएं अनंत सुख में लीन हैं। इसका मुख्य कारण है कि संसारी आत्माएं कर्मों के बंधन से बंधी हुई हैं और मोक्ष में गई आत्मा कर्मों के बंधन से सर्वथा मुक्त है। दुखों का मुख्य कारण कर्म है। आत्म में कर्म के प्रवेश के पांच द्वार-मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद कषाय और योग हैं। जिनेश्वर परमात्मा के वचनों पर अश्रद्धा मिथ्यात्व का प्रमुख कारण है। उन्होंने कहा कि मिथ्यात्व के अस्तित्व में दिया गया दान और किया गया तप आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं करा सकता है। जैसे इमारत की मजबूती और अस्तित्व उसकी नींव के आधार पर है, वैसे ही तप, जप, चारित्र, ज्ञान आदि की शक्ति मिथ्यात्व के उन्मूलन और समकित की नींव के आधार पर है। ( tamil nadu )
Coimbatore मिथ्यात्व के नाश और समकित की प्राप्ति के बाद जीवात्मा की हर प्रवृति का तरीका बदल जाता है। उसे पाप कर्म का आचरण करने से भय लगता है। आत्मा के भीतर समकित की ज्योत प्रकट करने के लिए सर्वश्रेष्ठ आलंबन परमात्मा के वचनों का श्रवण रुप प्रवचन ही है। नियमित रुप से प्रवचन का श्रवण करने से आत्मा के भीतर ज्ञान का प्रकाश और समकित की प्राप्ति संभव है। प्रवचन के पश्चात सुपाश्र्वनाथ जैन मंदिर में सत्रह भेदी पूजा का आयोजन हुआ।

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