उपकारी के उपकार को न भूलें

उपकारी के उपकार को न भूलें
उपकारी के उपकार को न भूलें

Dilip Sharma | Updated: 20 Sep 2019, 12:00:55 PM (IST) Coimbatore, Coimbatore, Tamil Nadu, India

कृतज्ञ दाता अपने गुरु को उपकारी मानकर तात्विक दृष्टि से गौरव करता है, उससे गुणों की वृद्धि होती है। इसलिए उसे धर्म के अधिकार विषय में योग्य कहा जाता है।

कोयम्बत्तूर. कृतज्ञ दाता अपने गुरु को उपकारी मानकर तात्विक दृष्टि से गौरव करता है, उससे गुणों की वृद्धि होती है। इसलिए उसे धर्म के अधिकार विषय में योग्य कहा जाता है।
ये बातें आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने Coimbatore बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट की ओर से जैन उपाश्रय में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत आयोजित धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि उपकारी के उपकार को मानने वाला कृतज्ञ है। उसे याद कर सदैव वह चुकाने का भी प्रयास करता है। हमेशा यह इच्छा रखता है कि उसे कब अवसर मिले कि वह अपने उपकारी का सहायक बन सके। उन्होंने कहा कि माता-पिता जन्म देकर उचित लालन-पालन कर तमाम जरुरतों को पूरा करते हुए उच्च शिक्षा की सुविधा देते हैं। उनके उपकार को सदैव याद रखना चाहिए और तन मन धन से उनकी सेवा करनी चाहिए।
उन्होंंने कहा कि अक्षर ज्ञान देने वाले विद्या गुरु का भी कम उपकार नहीं होता। अज्ञानता के कारण शिशु का जीवन पशुवत होता है व्यवहारिक शिक्षण के बाद उसमें ज्ञान का प्रकाश और विवेक का पुंज प्रकट होता है। ज्ञान से विवेक प्रकट होता है। जिसे उसे कर्तव्य- अकृत्य का भान होता है। अपनी आत्मा पर सर्वोत्तम उपकार धर्मदाता गुरु का है।
पिता लौकिक उपकारी हैं जबकि धर्म गुरू तो लोकोत्तर उपकारी है। कहावत है कि गुरु बिना ज्ञान नहीं, धर्म गुरू के बिना हमें आत्मा के शुद्ध स्वरूप आदि का बोध कैसे हो सकता है। साक्षात तीर्थंकर परमात्मा के विरह काल में आचार्य भगवंत तीर्थंकर प्रतिरुपित धर्म की देशना देते हैं। इस प्रकार वह भी उपकारक हैं। उन्हीं की धर्मदेशना से हमें आत्म ज्ञान होता है। आत्मा की गति-अगति, कर्म बंधन, कर्म मुक्ति, जीव -अजीव आदि नौ तत्वों का ज्ञान धर्म देशना के श्रवण से होता है। आजीवन सेवा करने से भी धर्म गुरू का उपकार नहीं चुकाया जा सकता। हमें ऐसा उपकार करे नहीं भूलते हुए उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैन शासन में नवकार महामंत्र का अत्यधिक महत्व है। नमो अर्थात नमस्कार का भाव, साधक पंचप्रमेष्ठी को नमस्कार करके परमेष्ठी परमात्मा के उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करता है।
उन्होंने कहा कि कृतज्ञता का भाव आने के बाद ही धर्म का प्रारंभ होता है। कृतज्ञता मानता का मूलभूत प्राण है। जीवन में कृतज्ञता नहीं है तो मानव पशु से भी हल्का है। रोटी का टूकड़ा खाने वाला श्वान भी मालिक के प्रति वफादार होता है। रात्रि में मालिक की रक्षा करता है। २४ सितम्बर से वर्धमान तप प्रारंभ होगा।

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