क्षमाभाव सिखाता है धर्म : आचार्य विजय रत्नसेन

क्षमाभाव सिखाता है धर्म : आचार्य विजय रत्नसेन

Rahul sharma | Publish: Aug, 13 2019 11:46:47 AM (IST) Coimbatore, Coimbatore, Tamil Nadu, India

जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आत्मा की संसार के वृद्धि के चार कारण है। क्रोध, मान, माया व लोभ। आत्मा का शुद्ध स्वभाव तो निष्कषाय है परंतु जीवन के दौरान मनुष्य अनेक छोटे बड़े निमित्तों के कारण क्रोध आदि कषायों के वश में हो जाता है।

कोयम्बत्तूर.जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आत्मा की संसार के वृद्धि के चार कारण है। क्रोध, मान, माया व लोभ। आत्मा का शुद्ध स्वभाव तो निष्कषाय है परंतु जीवन के दौरान मनुष्य अनेक छोटे बड़े निमित्तों के कारण क्रोध आदि कषायों के वश में हो जाता है। यही कषाय आत्मा के अनंत संसार में वृद्धि का कारण बनते हैं।
आचार्य सोमवार को Coimbatore बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में राजस्थानी संघ भवन में आयोजित चातुर्मास कार्यक्रम के तहत धर्मसभा में प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि कषाय चार प्रकार के होते हैं। जैसे पानी में लकीर खींचते ही क्षण भर में वह मिट जाती है । उसी प्रकार कुछ कषाय ऐसे क्षणिक होते हैं जो फौरन मिट जाते हैं। कुछ कषाय मिट्टी में लकीर खींचने जैसे होते हैं जो कुछ समय रहते हैं लेकिन हवा चलने के बाद मिट जाते हैं। इसमें अपनी भूल का ऐहसास होने पर पश्चाताप के बाद क्षमा भाव पैदा कर देते हैं।
आचार्य ने कहा कि तीसरा कषाय तालाब की रेखा के समान होते हैं। जो गर्मी के दिनों में पानी सूखने पर तालाब में दरारें व पानी नजर आता है जो पानी आने के बाद स्वत: ही मिट जाती है। ऐसे में यह कषाय कुछ समय रहते हैं, लेकिन बाद में मिट जाते हैं। मन में क्षमा भाव पैदा नहीं होने देता लेकिन अधिक समय बीत जाने के बाद भूल का पश्चाताप हो जाता है।
आचार्य ने बताया कि चौथा कषाय पहाड़ों की रेखा के समान होता है जो कभी नहीं जुड़ता है । जीवनपर्यंत नहीं मिटता व जन्म जन्मांतर तक आत्मा को संसार में परिभ्रमण कराता है। चौथा कषाय भयंकर है जो आत्मा के सारे गुणों का नाश कर आत्मा की विडंबना करता है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में यही सिखाया जाता है कि जैसे के साथ तैसा। यानि जो आपके साथ अच्छा व्यवहार करे उसके साथ अच्छा करें जो बुरा व्यवहार करें उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए। लेकिन धर्म हमें क्षमाभाव को आत्मसात करना सिखाता है। अपकारी के साथ उपकार करना धर्म ही सिखाता है। उपकार के कार्य हमारे कमो्र्रं का फल है। आचार्य ने कहा कि अपकार कराने वाला भी उस कार्य का क्षय कराने में सहायक होता है वह भी उपकार कराने वाला ही माना जा सकता है। तर्क से भी सिद्ध होने वाली इस बात को हमारा मन स्वीकार नहीं करता। मन स्वीकार भी कर ले लेकिन आत्मा के कु संस्कार निमित्त मिलते ही पुन: जागृत हो जाते हैं और हमें क्रोध आदि पापों से जोड़ कर आत्मा के चिरकालीन संसार का सजृन कर देते हैं। मंगलवार को भी नियमित प्रवचन सुबह ९.१५ बजे होंगे।

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