श्रद्धा से आत्म विकास संभव

श्रद्धा से आत्म विकास संभव
श्रद्धा से आत्म विकास संभव

Dilip Sharma | Updated: 11 Oct 2019, 02:29:07 PM (IST) Coimbatore, Coimbatore, Tamil Nadu, India

जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आत्मा के भीतर सद्कर्म के प्रति श्रद्धा से ही जीवात्मा का आत्म विकास प्रारंभ होता है। भूतकाल पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि अनंत काल बीतने के बावजूद आत्मा को मोक्ष नहीं मिल पाया है।

कोयम्बत्तूर. जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आत्मा के भीतर सद्कर्म के प्रति श्रद्धा से ही जीवात्मा का आत्म विकास प्रारंभ होता है। भूतकाल पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि अनंत काल बीतने के बावजूद आत्मा को मोक्ष नहीं मिल पाया है।
वह राजस्थानी संघ भवन में बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट की ओर से चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार खेत में एक बीज बोने पर प्रकृति उसे हजारों बीज लौटाती है उसी प्रकार हृदय रूपी खेत में धर्म का बीज बोने पर धर्म सत्ता जीवात्मा को सिद्धि पद उपहार स्वरूप देती है। हृदय में धर्म के प्रति शुभ अनुमोदना होने पर परमात्मा के प्रति अहोभाव होता है तब धर्मबीज आत्मा को शाश्वत साम्राज्य के रूप में मोक्ष दिलवाता है। जीवन में धर्म आने पर विचारधारा बदल जाती है।
उन्होंने कहा कि अनंत काल से आत्मा चार गतियों में ८४ लाख जीवों में भटक रही है। कभी देव, कभी भिखारी, कभी सत्ताधीश कभी दाने दाने को तरसती है। कभी बुद्धिमान बन सम्मान व कभी तिरस्कार सहन करती है। इस सजा का एक कारण है वह सतत ऐसी प्रवृत्ति कर रही है जिससे आत्मा को कर्मों का बंध हो। कर्म का बंध करने पर आत्मा को उसकी सजा भुगतनी पड़ती है। कर्म किसी को नहीं छोड़ता। राजा को भी फटकार लगाता है। तीर्थंकर आत्मा भी जो उस भव में निर्दोष होती है लेकिन उसके पूर्व के कर्मों में यदि कोई भूल हो तो उसे सजा भुगतनी पड़ती है। आत्मा को संसार से मुक्त होने की इच्छा ही नहीं होती इसलिए उसे बार बार परिभ्रमण करना पड़ता है। जिसे मोक्ष पाना है उसे आत्मा के परम शत्रु मिथ्यात्व का त्याग कर सम्यग दर्शन को पाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कर्म के उदय के कारण सम्यग दृष्टि आत्मा संसार के सुखों का संपूर्ण त्याग न कर सके तो भी उसका अंतर मन सुखों से अलिप्त ही रहता है।

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