दुश्मन नहीं दुश्मनी खत्म हो

जैन आचार्य विजय रत्नसूरीश्वर ने कहा कि दुनिया दुश्मन को समाप्त करने की बात करती है, लेकिन भगवान महावीर ने हृदय में बसी दुश्मनी को समाप्त करने की बात कही।

कोयम्बत्तूर. जैन आचार्य विजय रत्नसूरीश्वर ने कहा कि दुनिया दुश्मन को समाप्त करने की बात करती है, लेकिन भगवान महावीर ने हृदय में बसी दुश्मनी को समाप्त करने की बात कही। दुश्मन को समाप्त कर होने वाली शांति अल्प होती है, जबकि दुश्मनी को समाप्त करने वाली शांति चिरंजीवी होती है। दुश्मन को समाप्त करने का क्षणिक आनंद है, जबकि दुश्मनी समाप्त करने का आनंद दीर्घ होता है।
आचार्य यहां बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में जैन मैन्योर में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे नीम के पत्तों को उबाला जाएगा उसकी कड़वाहट बढ़ जाएगी। इसी प्रकार मन में क्रोध बढ़ते रहने से बैर जन्म ले लेता है। जिसे खत्म करना कठिन हो जाता है। आचार्य ने कहा कि क्रोध में आने पर बालक भी माता को लात मार देता है, लेकिन वह क्षणिक होता है बाद में वह माता की गोद में जाकर सो जाता है। बालक जैसी सरलता रखें तो बैर भाव बन ही नहीं सकता, लेकिन उम्र बढऩे के साथ व्यक्ति उतना सरल नहीं रह पाता। हाथ से कांच का ग्लास फूट जाए तो कहते हैं कि कांच का था टूटना ही था। जब नौकर के हाथ से गिर जाए तो उसे भला-बुरा कह देते हैं। उन्होंने कहा कि आवेश जब वैर में बदल जाता है फिर वैर हिंसा का रूप ले लेता है। अनादिकाल से मानव जीवन का स्वभाव रहता है जीव, क्रोध, वैर, ईष्र्या आदि तुच्छ तत्वों का रस है, जबकि क्षमा, प्रेम, उदारता आदि तत्व महान होने पर भी उन्हें अपनाने में अल्प रुचि है।
इसका कारण भूतकाल में आत्मा ने क्रोध बैर, ईष्र्या आदि तत्वों का खूब अभ्यास किया जिससे तुच्छ प्रवृत्तियां स्वच्छ हो जाता है। क्षमा, प्रेम, उदारता व गंभीरता आदि तत्वों के सेवन का आत्मा को अभ्यास नहीं है इस कारण इन्हें छोडऩे के लिए मन शीघ्र तैयार हो जाता है।

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