समता भाव की साधना कठिन

जैन आचार्य विजयरत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि वीतराग परमात्मा ने भव भ्रमण के बंधनों से मुक्त होने के लिए सामायिक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताया है।

By: Dilip

Published: 06 Jan 2020, 12:12 PM IST

इरोड. जैन आचार्य विजयरत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि वीतराग परमात्मा ने भव भ्रमण के बंधनों से मुक्त होने के लिए सामायिक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताया है। अल्प काल के लिए भी समता भाव की प्राप्ति समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्रदान करने में सहायक होती है। ्र
आचार्य रविवार को शंखेश्वर पाश्र्वनाथ जिनालय तिरप्पातुर में सामयिक के मौके पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि समता भाव की साधना कठिन है। हमारा मन वृक्ष के पत्ते के समान चंचल होता है। चंचल मन को स्थिर कर हमारे मन में शत्रु और मित्र, सोना और पत्थर, मोती और मिट्टी, अनुकूलता व प्रतिकूलता सभी प्रसंगों में समभाव रखना ही सच्चा समता भाव है। कई महापुरुष अंत समय तक कष्टों के बावजूद विचलित नहीं हुए और मुक्ति प्राप्त की। समता भाव पाने के लिए सर्वपापों से विराम पाकर 48 मिनट तक धर्म की सामायिक करनी चाहिए। सोमवार को आचार्य संघ विहार कर 13 जनवरी तक वैल्लोर पहुुंचेंगे।

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