सफल होने पर अभिमान करना अनुचित

संसार में प्रत्येक जीव सफलता चाहता है। वह जहां कार्यरत है वहां अपनी पहचान बनाना चाहता है। मेहनत से सफलता पाना तो उचित है लेकिन सफल होकर अभिमान करना अनुचित है। यह बात जैन मुनि हितेशचंद्र विजय ने कही।

By: Dilip

Published: 08 Dec 2019, 01:35 PM IST

कोयम्बत्तूर. संसार में प्रत्येक जीव सफलता चाहता है। वह जहां कार्यरत है वहां अपनी पहचान बनाना चाहता है। मेहनत से सफलता पाना तो उचित है लेकिन सफल होकर अभिमान करना अनुचित है। यह बात जैन मुनि हितेशचंद्र विजय ने कही।
वह यहां सुपाश्र्वनाथ जैन आराधना भवन में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। इस पहचान बनाने के लिए वह प्रयासरत रहता है। सफलता मिलती है तो प्रसन्न हो जाता है। असफल होने पर बैचेन हो जाता है। दौड़ भाग में वह भूल जाता है कि उसने कुछ छोड़ तो नहीं दिया। सोचने पर पता चलता है कि वह मान सम्मान तो पा गया लेकिन नाते रिश्तेदार सब पीछे छूट गए।
उन्होंने कहा कि भगवान के राम के राजतिलक के दौरान अचानक उन्हें वनवास का आदेश दे दिया तब भी वह जरा भी विचलित नहीं हुए। आदेश की पालना कर वह वन के लिए रवाना हो गए। राज सत्ता की लालसा में रहते तो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम पद की प्रशंसा या उनके शौर्य का जनमानस का ज्ञान कैसे होता। मान सम्मान कर्म के अधीन है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर सोच लेते कि जंगल में उन्हें परेशान किया जाएगा लोग पत्थर मारेंगे तो वह कभी वर्धमान से महावीर नहीं बनते। धैर्य व समभाव में रहे तो वह जन-जन की आस्था का केन्द्र नहीं बनते। मान सम्मान भगवान ने भी प्राप्त किया लेकिन मन में धैर्य को अपनाकर सम्मान की लालसा में उन्होंने समभाव नहीं छोड़ा। उन्होंने सदैव परमार्थ का कार्य किया लेकिन स्वार्थ का नहीं किया।

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