लावारिसों का इलाज कराकर मिलाते अपनों से

घर से दूर आकर लावारिसों की तरह जिंदगी गुजार रहे लोगों की बीमारी का इलाज कराने एवं उन्हें घर पहुंचाकर अपनों से मिलाने का जुनून शहर के कुछ युवाओं को सुकून दे रहा है।

By: Harish kushwah

Updated: 03 Jan 2020, 07:15 PM IST

ग्वालियर. घर से दूर आकर लावारिसों की तरह जिंदगी गुजार रहे लोगों की बीमारी का इलाज कराने एवं उन्हें घर पहुंचाकर अपनों से मिलाने का जुनून शहर के कुछ युवाओं को सुकून दे रहा है। यह सेवाभावी कार्य पांच लोगों की टीम पिछले चार साल से कर रही है। अब तक दो दर्जन से ज्यादा बच्चों, बूढ़ों को उनके परिवार से मिला चुके हैं।

केयर एंड अवेयर संस्था के सदस्य हरिमोहन ने बताया कि लोग उनके काम को समाज सेवा मानते हैं, लेकिन टीम इसे सरकार के प्रति विरोध मानकर अपनी जिम्मेदारी निभाती है। क्योंकि जिन लावारिसों का ध्यान रखना सरकार का फर्ज है, उनकी तरफ देखने की सुध किसी सरकारी एजेंसी को नहीं है। हरिमोहन बताते हैं कि मंदिर के बाहर जिंदगी गुजारने वाले कौन हैं, कहां से आए हैं, उनके बारे में कोई नहीं सोचता। चार साल पहले मंदिर के बाहर रहने वाले कुछ लोगों को बीमारी की हालत में देखा तो उनकी छोटी बीमारी इलाज के अभाव में गंभीर हो रही थी, तो पांच दोस्तों की टीम ने उनका इलाज शुरू किया। जब अनजान व्यक्ति उनकी हमदर्दी और इलाज से स्वस्थ हुआ तो सुकून मिला। फिर यह सिलसिला शुरू हो गया। उसके बाद शहर के मंदिरों के बाहर ऐसे लोगों को तलाशा जो बीमार थे। रोज उनका इलाज शुरू किया तो उन लोगों से दोस्ती भी हो गई। बातों में पता चला कि अपनों से दूर निकल आए हैं, अब वापस लौटने का उनके पास जरिया नहीं है, तो ऐसे लोगों की वापसी का इंतजाम किया।

बिछड़ों को अपनों से मिलाया तो सुकून मिला

लावारिसों में ज्यादातर मानसिक रोगी और जिंदगी से परेशान लोग थे। जब उनके अपनों को तलाश कर घर पहुंचाया तो परिजन की खुशी ने टीम को सुकून दिया। हरिमोहन कहते हैं कि सबसे ज्यादा परेशानी ऐसे लोगों के इलाज और घर पहुंचाने में आने वाले खर्च की होती थी। लोगों से इसके लिए पैसे मांगने में शर्म आती थी, तो तय किया किसी से पैसे नहीं मांगेंगे, बल्कि घर में इकट्ठे रददी कागज, अखबार दान में लेंगे। इससे किसी को दिक्कत नहीं हुई। करीब तीन हजार से ज्यादा लोग उनकी मददगारों की सूची में शामिल हैं, जिनके यहां से मिली रददी को बेचकर लावारिसों की मदद का खर्च उठाते हैं।

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