क्यों दम तोड़ देती हैं वनांचल में सरकार की बड़ी से बड़ी योजना, ये है कारण

क्यों दम तोड़ देती हैं वनांचल में सरकार की बड़ी से बड़ी योजना, ये है कारण

Puspendra Tiwari | Publish: Sep, 09 2018 09:35:18 AM (IST) Damoh, Madhya Pradesh, India

सरकार के दावों को आइना दिखा रहा जिले का यह इलाका

पुष्पेंद्र तिवारी दमोह/ यूसुफ पठान मडिय़ादो. जिले के वनांचलों में लोगों को दो जून की रोटी के लिए रोजना अपनी जान दाव पर लगानी पड़ रही है। खासबात यह है कि इन लोगों में वो मासूम बच्चे भी शामिल हैं जो देश का भविष्य माने जाते हैं। पढ़ाई लिखाई की उम्र में बच्चे बफर जोन के जंगल में जाकर रोजना लकड़ी बटोरते हैं और फिर रहवासी इलाकों में जाकर इन्हें बेचते हैं। लकड़ी बेचकर होने वाली आमदानी ही इन मासूमों के परिवार के पालन का मात्र एक स्रोत है। जिले के मडिय़ादो क्षेत्र में शामिल पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन इलाके में ऐसा ही देखा जा रहा है।


इस इलाके के वनांचल में स्थित गांवों में मिलने वाली सुविधाओं की बात की जाए तो वह भी शून्य की स्थिति में हैं। लोगों के लिए ना ही पर्याप्त पेयजल की व्यवस्था है और ना ही बिजली व सड़कों की सुविधा का लाभ मिल पा रहा है। खासबात यह है कि इन इलाकों में सरकारी स्कूल तो हैं, लेकिन शिक्षकों की मनमर्जी से स्कूल खुलते हैं। यहां पदस्थ शिक्षकों को इस बात से सरोकार नहीं है कि बच्चे जो पढ़ाई की उम्र में काम कर रहे हैं उन्हें स्कूल आने के लिए प्रेरित किया जाए।
देखा गया है कि मडिय़ादो उप तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में रोजगार की स्थिति शून्य है। यहां महिलाएं बच्चे परिवार के भरण पोषण के लिए सिर बोझा ढोने मजबूर हंै। यह प्रतिदिन 15 से 20 किमी दूरी हर दिन तय करते हैं और फिर रहवासी गांवों में पहुंचकर 70-80 रुपए में लकड़ी का गठ्ठा बेच देते हैं। आदिवासी महिला कमला, चमेली, उजयारी बाई का कहना है कि गांव में कोई रोजगार नहीं है, जिस कारण अधिकांश लोग मजदूरी करने परदेश में हैं, महिलाओं को भी कोई काम नहीं जिससे लकड़ी बेचकर आटा, दाल, चांवल और अन्य जरूरत का सामान लेकर दो जून की रोटी चल रही है।


शासन की योजनाएं इनके लिए कोषो दूर है


गांव में मजदूरी, आवास, शौचालय, बिजली, पानी सपना साबित हो रहा है। दरअसल चुनाव के आहट के साथ ही जनप्रतिनिधियों के द्वारा वादों और आश्वासनों का दौर शुरू हो गया है। जिन आदीवासियों के लिए के लिए जनप्रतिनिधियों ने हमदर्दी का चोला पहना था, वह आमजन समूह वहीं पुरानी स्थिति में जस का तस खड़ा है। अब विधानसभा चुनाव का समय निकट देखते हुए दोनों पार्टियों के जनप्रतिनिधी जनता के बीच पहुंच कर फिर प्रलोभन देने का प्रयास करने लगे है।


यहां आवास को तरस रहे गरीब आदिवासी


ग्राम पंचायत घोघरा के मजरा, भूलखेड़ा, जुनेरी व ग्राम पंचायत बछामा के मदनपुरा, श्यामरसिंघी, किसानपुरा, उदयपुरा व स्वय बछामा गांव में एक भी पीएम आवास योजना का एक भी हितग्राही नहीं है। उक्त गांवों के सैकड़ों परिवार कच्चे पत्थर से ढके टपरानुमा मकानों में रहने मजबूर है। सभी गांवों में रोजगार , बिजली का आभाव है। यहां के लोग वर्षा आधारित खेती पर आश्रित हैं, जो इस दौर में पूरी तरह फेल है।


यह है इनकी हकीकत


घोघरा निवासी लाखन, देवसींग, मदन आदिवासी का कहना है, गांव में सरपंच सचिव रोजगार सहायक द्वारा कोई मजदूरी कार्य नहीं दिया जाता है। गांव में कई मृतकों के नाम शौचालय निर्माण करा दिए गए हैं और जो जीवित हैं और शौचालय निर्माण के लिए चक्कर काट रहे हैं।


ऐसा ही हाल ग्राम पंचायत बछामा का है। यहां के परसू आदिवासी का आरोप है कि ग्राम पंचायत के पांच गांवों में एक भी पीएम आवास योजना का लाभ किसी को प्राप्त नहीं हुआ। ग्रामीणों को बड़ी उम्मीद थी की यहां के सरपंच इंद्रपाल पटैल के पिता शिवचरण पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर हैं। इसी उम्मीद पर मतदाताओं ने मतदान किया था कि अब विकास के सारे दरवाजे खुल जाएंगे, लेकिन ठीक विपरीत हुआ। ग्रामीण कहते हंै कि हम हर बार वोट देते हैं, लेकिन योजनाओं का लाभ हमें नहीं मिलता है। जिस कारण इस बार विधानसभा चुनाव का हम वहिष्कार करेंगे।


वर्जन


दोनों ग्राम पंचायतों में शौचालय निर्माण कराए जा रहे हैं। सर्वे के दौरान गड़बड़ी से कुछ गांव पीएम आवास योजना के लाभ से वंचित हैं, वहां प्रयास कर रहे हैं कि पात्रों को पीएम योजना का लाभ मिल सके।
राजेंद्र चोबे, सीईओ

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