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दमोह आजादी के पहले भारत माता के लिए दिया बलिदान

नरसिंहगढ़ के सूबेदार, सहयोगी व दीवान के 18 परिजनों को दी गई फांसी

दमोह

Published: August 14, 2021 10:11:43 pm

दमोह. दमोह जिले का प्राचीन इतिहास है, सिंग्रामपुर में मिले पाषाण हथियार इस बात का साक्षी है, दमोह जिला में संघर्ष की गाथा सदियों से चली आ रही है।
समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, चेदी साम्राज्य, कलचुरी राजाओं, चंदेलों, मुगलों, खिलजी, तुगलकवंश, गौड़ वंश का शासन रहा है। मुगलों से लड़ते रानी दुर्गावती की वीरागाथा सिंगौरगढ़ किला आज भी कह रहा है। क्षेत्र में बुंदेलो ने कुछ समय के लिए यहां राज्य किया, इसके बाद मराठों ने राज्य किया। सन् 1888 में पेशवा की मृत्यु के बाद अंग्रेजो ने मराठों को उखाड फैंका तब से 1947 तक अंग्रेजों को भगाने की लंबी लड़ाई चली। जिसमें राजाओं, सूबेदारों ने हथियार उठाए। महात्मा गांधी के आह्वान पर अहिसंक आंदोलन चलाए। कई बार स्कूलों नगर पालिका और कार्यालय में तिरंगा फहराया और यातनाएं सहीं।
अंग्रेजों से भारत के स्वतंत्र कराने के लिए दमोह ने देश की स्वतंत्रता के लिए हो रहे संघर्ष में बराबरी से हिस्सा लिया। हिंडोरिया के ठाकुर किशोर सिंह, सिग्रामपुर के राजा देवी सिंह, करीजोग के पंचम सिंह, गंगाधर राव, रघुनाथ राव, मेजबान सिंह, गोविंद राव के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना से जंग लड़ी गई और अपने शीश कटाकर बलिदान दिया। संघर्ष की क्रांति के बाद दमोह में आजादी के लिए बच्चों, युवाओं ने कई आंदोलन चलाए। अंग्रेजी सेना को बाहर करने के लिए गांधी जी के बताए मार्ग पर आगे बढ़ते रहे और अंग्रेजी हुक्मरानों की लाठियां सहते रहे।
6 माह के मासूम को दी थी फांसी
1818 में तत्कालीन पेशवा को अलग किए जाने के बाद नरसिंहगढ़ को अंग्रेजी राज में मिलाने के बाद भी मराठा सूबेदारों को यथावत रखा गया। लेेकिन 1857 की क्रांति में तत्कालीन सूबेदार पं. रघुनाथ राव करमरकर और उनके दीवान पं. अजबदास तिवारी ने शाहगढ़ के राजा बखत बली के यहां शरण ली। 17-18 सितंबर को दमोह से नरसिंहगढ़ पहुंची किनकिनी की टुकड़ी ने करमरकर से बागियों को हवाले करने के लिए कहा। इंकार करने पर अंग्रेजी टुकड़ी ने किले पर कब्जा कर पं. रघुनाथ राव करमरकर, सहयोगी पं. रामचंद्र राव व दीवान अजबदास तिवारी व उनके 18 परिजनों को फांसी पर लटका दिया, जिसमें 6 माह का बच्चा भी शामिल था। यह फांसी नरसिंहगढ़ के नाले में दी गई थी, जिसे लोग आज भी फसिंया नाले के नाम से जाने जाते हैं।
जिंदा मुर्दा पकडऩे पर एक हजार का इनाम
ेेेहिंडोरिया के राजा किशोर किशोर ने 10 जुलाई 1857 को अपने साथियों के साथ दमोह के थाने पर हमला कर उसे ढहा दिया। तहसील ऑफिस का रिकार्ड नष्ट कर दिया। तत्कालीन कैप्टेन पिंकी 31 इंफ्रेंट्री की दो बटालियनों और दो गन्स के साथ सागर से दमो आए। जिंदा या मुर्दा पकडऩे पर एक हजार रुपए का इनाम रखा। इस आजादी के दीवाने के मृत्यु अपनी सेना के साथ अंग्रेजो से लोहा लेते हुई थी।
अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा, मिली फांसी
इटारसी में रेलवे कैबिनमैन के पद पर कार्यरत दमोह फुटेरा मोहल्ला निवासी यशवंत सिंह के मन में आजादी का परवाना जला। उनके साथ तेजगढ़ के देवनारायण तिवारी ने पहले इटारसी में ट्रेन की पटरी उखाड़ कर ट्रेन गिराई। फिर खंडवा और मांडवा के बीच यात्री ट्रेन में दो अंग्रेजों को मारा। अंग्रजों ने पकड़कर जेल में डाला। 22 साल की उम्र में 11 दिसंबर 1931 को फांसी की सजा दी गई। दमोह जिले के दो युवा क्रांतिकारियों ने देश के लिए बलिदान दिया। शहीद यशवंत सिंह चौक बन चुका है, लेकिन तेजगढ़ के देवनारायण तिवारी की शहादत को लोग भुला चुके हैं।
बच्चों की टोली लेकर निकाली प्रभात फेरी
हर प्रसाद गुप्ता ने प्राथमिक शिक्षा के बाद साथियों की टोली बनाई और प्रभात फेरी निकालकर आजादी का बिगुल बजाने लगे। लोगों में आजादी की अलख जगाने के कारण उन्हें कप्तान साहब की उपाधि मिली। 1929 में अंग्रेजी हुकूमत के हत्थे चढ़ गए। 6 माह की जेल की सजा हुई। 1931 में दमोह टाउनहाल में तिरंगा फहराने वाली टोली में कप्तान साहब सबसे आगे थे। त्रिपुरी कांग्रेस के सदस्य 1939 में डिस्ट्रिक काउंसिल के मेंबर और मप्र कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे।
12 साल की उम्र में स्कूल पर फहराया तिरंगा
बाबूलाल पलंदी जब 12 साल के थे तो अपने स्कूल में कांग्रेस का तिरंगा फहराकर आजादी की शुरुआत की। यहीं से स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े असहयोग आंदोलन के दौरान विद्यार्थी संगठन तैयार किया। नमक आंदोलन, जंगल, कानून तोड़ों, विदेशी कपड़े के आंदोलन में कूद पड़़े। कानून तोड़ों आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कोर्ट से दंडित होने पर स्कूल से निष्कासित किया गया। 13 अगस्त 1942 को गांधी चौक मैदान से गिरफ्तार किए गए। सागर जेल में संदेह के घेरे में रहने पर नागपुर जेल भेजा।
असला से भारी मालगाड़ी को चट्टान से रोका
डॉ. पीडी शैलार ने दसवीं की पढ़ाई के बाद डॉक्ट्रेट की। अंग्रेजों की हुकुमत के खिलाफ हुंकार भरी। 1940 के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी हुंकार से अंग्रेज भी दहलने लगे थे। 1942 को उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया। जेल की यातनाओं के बाद आंख खराब हुई। छूटने के बाद घटेरा रेलवे स्टेशन पर अंग्रेजों की असले से भरी मालगाड़ी के सामने बड़ी चट्टान अकेले गिराकर शैल की उपाधि मिली तभी से नेमा से शैलार हो गए।
मेला में भाषण देने पर गिरफ्तार
दमोह जिले के हटा अंचल के पं. गया प्रसाद पांडेय ने 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के करो या मरो अंग्रेजो भारत छोड़ों के आह्वान पर वे अपने इलाके के नायक बनकर उभरे, इसी आंदोलन में 1942 में नागपंचमी के दिन हटा के बोरी गांव में चल रहे मेले मेें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारण देने के जुर्म में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी हुकूमत से लडऩे के दौरान उन्हें व उनके परिवार को कई यातनाएं झेलना पड़ी।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया सम्मानित
बाबूलाल ताम्रकार बुकसेलर सागर से दमोह आकर रेलवे कैंटीन चलाने लगे थे, लेकिन इस दौरान आजादी की चिंता सताने लगी। वह स्वतंत्रता सैनानी बनकर उभरने लगे। अंग्रेजों की आंखों में खटकने पर 1930 में एक साल का कारावास भोगना पड़ा। इसके बाद भी भी उनका आत्मविश्वास डिगा नहीं। वह लगातार स्वतंत्रा समर में योगदान देते रहे। 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिल्ली में उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया था।
सुभाषचंद्र बोष के त्रिपुरी सम्मेलन से बने सेनानी
पूरनचंद जैन गनेशगंज शाहपुर 1939 में जबलपुर में सुभाषचंद बोष के त्रिपुरी अधिवेशन में शामिल हुए। क्रांतिकारियों की सूची में शामिल हो गए। 4 सितंबर 1942 को नगर पालिका परिषद दमोह में तिरंगा फहराने के आरोप में गिरफ्तार हुए। 7 माह 14 दिन की सागर जेल में सजा काटी। स्वतंत्रता मिली तो आजादी की सांस ली और नया भारत का सपना संजोए रहे।
Damoh sacrificed for Mother India before independence
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