बड़े बाबा के मोक्ष कल्याणक दिवस पर कुंडलपुर में हुआ लाडू महोत्सव

देशभर से आए भक्तों की रही मौजूदगी

By: Rajesh Kumar Pandey

Published: 15 Jan 2018, 03:21 PM IST

दमोह.जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव बड़े बाबा का मोक्ष कल्याणक निर्वाण महोत्सव जिले भर में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में विराजमान बड़े बाबा की प्रतिमा के समक्ष सैकड़ों लोगों ने लाडू चढ़ाया और बड़े बाबा के जयकारे लगाए। देश भर से आए श्रद्धालुओं की मौजूदगी कार्यक्रम में रही। सोमवार को सुबह से ही बड़े बाबा मंदिर में भक्तों का पहुंचना शुरू हो गया था। जहां बड़ी संख्या में पीत वस्त्र धारी श्रावक बड़े बाबा के मंदिर में कलश लेकर पहुंचे। बड़े बाबा का जल कलशों से अभिषेक किया गया। इस मौके पर शांतिधारा का सौभाग्य भी श्रावकों को प्राप्त हुआ। बड़े बाबा के अभिषेक शांतिधारा के पश्चात निर्वाण लाडू चढ़ाया गया।
इस मौके पर उपस्थित श्रद्धालुओं द्वारा बड़े बाबा के समक्ष सामूहिक रुप से निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। साथ ही सामूहिक आरती की गई। इस मौके पर जगह-जगह विधान पूजन भी किए गए साथ ही मिष्ठान वितरण किया गया।
भगवान आदिनाथ ऋषभदेव बड़े बाबा: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नौवीं के दिन सूर्योदय के समय हुआ। उन्हें ऋषभनाथ भी कहा जाता है, उन्हें जन्म से ही सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। वह समस्त कलाओं के ज्ञाता और सरस्वती के स्वामी थे। युवा होने पर कच्छ और महाकच्‍छ की दो बहनों यशस्वती (या नंदा) और सुनंदा से ऋषभनाथ का विवाह हुआ। नंदा ने भरत को जन्म दिया जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट बने। उसी के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा (जैन धर्मावलंबियों की ऐसी मान्यता है)। आदिनाथ ऋषभनाथ सौ पुत्रों और ब्राह्मी तथा सुंदरी नामक दो पुत्रियों के पिता बने। भगवान ऋषभनाथ ने ही विवाह-संस्था की शुरुआत की और प्रजा को पहले-पहले असि (सैनिक कार्य), मसि (लेखन कार्य), कृषि (खेती), विद्या, शिल्प (विविध वस्तुओं का निर्माण) और वाणिज्य-व्यापार के लिए प्रेरित किया। कहा जाता है कि इसके पूर्व तक प्रजा की सभी जरूरतों को क्लपवृक्ष पूरा करते थे। उनका सूत्र वाक्य था- कृषि करों या ऋषि बनो। ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया फिर राज्य को अपने पु‍त्रों में विभाजित करके दिगम्बर तपस्वी बन गए। उनके साथ सैकड़ों लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। जब कभी वे भिक्षा मांगने जाते, लोग उन्हें सोना, चांदी, हीरे, रत्न, आभूषण आदि देते थे, लेकिन भोजन कोई नहीं देता था। इस प्रकार, उनके बहुत से अनुयायी भूख बर्दाश्त न कर सके और उन्होंने अपने अलग समूह बनाने प्रारंभ कर दिए। यह जैन धर्म में अनेक सम्प्रदायों की शुरुआत थी। जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं। अत: आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी 'अक्षय तृतीया' के नाम से प्रसिद्ध है। हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं। इस प्रकार, एक हजार वर्ष तक कठोर तप करके ऋषभनाथ को कैवल्य ज्ञान (भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। पूर्णता प्राप्त करके उन्होंने अपना मौन व्रत तोड़ा और संपूर्ण आर्यखंड में लगभग 99 हजार वर्ष तक धर्म-विहार किया और लोगों को उनके कर्तव्य और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति पाने के उपाय बताए। अपनी आयु के 14 दिन शेष रहने पर भगवान ऋषभनाथ हिमालय पर्वत के कैलाश शिखर पर समाधिलीन हो गए। वहीं माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्होंने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।

Rajesh Kumar Pandey Desk
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