scriptRecognize the nature of the soul and try to walk on the path of welfar | आत्मा के स्वरूप को पहचान कर कल्याण के मार्ग पर चलने का प्रयास करें: आचार्यश्री | Patrika News

आत्मा के स्वरूप को पहचान कर कल्याण के मार्ग पर चलने का प्रयास करें: आचार्यश्री

पंचकल्याणक के अंतिम दिन 24 तीर्थंकर भगवान को मोक्ष कल्याणक महोत्सव

दमोह

Published: February 23, 2022 09:10:21 pm

दमोह. कुंडलपुर महामहोत्सव में पंचकल्याणक के अंतिम दिन 24 तीर्थंकर भगवान को मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर भक्तों को दिव्य देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री विद्यासागर महाराज ने कहा कि आप लोग जीव की पहचान शरीर की अवस्था में देखकर ही कर लेते हैं। शरीरातीत अवस्था का हम विचार ही नहीं करते, क्या वह स्वरूप होगा पहले सोचो उसमें कुछ सुगंधित पदार्थ हैं। अन्य योग भी हो सकते हैं, उसमें से कुछ स्पर्श ज्ञान हो गया। सुगंधी आई तो नासिका में चली गई। गंध का बोध हो गया देख रहे हैं। आंखों से दिख रहा है, पीला पीला वर्ण का है, जो तेरे मन के द्वारा इन चारों गुणों का इंद्रियों के माध्यम से ज्ञात हो गया है। भैया यह बताओ उसका स्वाद कैसा आया छूने से तो स्वाद नहीं आया। सूंघने से भी स्वाद नहीं आया और सुनने से भी स्वाद नहीं आया। अब कौन सा रह गया महाराज हमें तो स्वाद बता दो स्वाद कहां से आएगा, भैया ऐसे ही सिद्ध परमेष्ठी का स्वाद किसी को भी नहीं आता। केवल जब शरीरातील होगा तब स्वाद आएगा। ऐसा आत्मा का स्वरूप है, हम आत्मा के स्वरूप की बात तो करते हैं। एस्वरूप से बात नहीं करते बात करने की नहीं है। लेकिन उसका अनुभव करने की बात है, प्रवचन शास्त्र में आचार्य कुंदकुंद देव ने इस स्वरूप का विवेचन किया है। अरिहंत परमेष्ठी आदि क्या करते है,अरिहंत परमेष्ठी वाना से रहित हो गए। क्योंकि अंतराय कर्म की बात समाप्त हो गई। वे क्या करते हैं, एकमात्र परमसुख का ध्यान करते हैं। जब महाराज अनंत हो गया। उन्हें उपलब्ध कौन से सुख का ध्यान करते हैं। अब उनको ध्यान करने की क्या आवश्यकता है, नहीं अरहंत परमेष्ठी होने के उपरांत भी वे स्वास्थ नहीं हुए हैं। महाराज, पर दवाएं खाएंगे नहीं ना दवाई से, ना हवा से, ना दुआ से वह तो एक मात्र स्वयंभुवा से ही स्वस्थ होंगे। फिर सोचा की अनंत चतुष्टय के बाद भी कुछ भ्रांतियां विद्यमान हैं। मंजिल से जुड़ा हुआ जीना रहता है लेकिन जीना जीना रहता है मंजिल नहीं रहती आपने खरीदा कोई महाप्रसाद और सीढिय़ों के ऊपर से जा रहे हैं, जा रहे हैं मार्ग क्या वस्तु है यही समझ में आ पाता है। लेकिन ऊपर पहुंचाने के लिए सीढियां होती है। किंतु सीढिय़ां तो मंजिल से बाहर ही रहती हैं। मार्ग हमेशा हमेशा मार्ग रहता है। आप लोगों ने वर्षों से यह सपना देखा है, अतीत की उन खामियों में भी गए होंगे आपने अनागत की ऊंचाइयों की ओर भी मन को दौड़ाया होगा। वह दिन वह घड़ी वह क्षण कब प्राप्त होगा। बड़े बाबा का पंचकल्याणक महोत्सव इन सब घाटियों से हटकर के तब वह होगा बोलो हो चुका है। हमें भी शुरू करना, हमें भी स्वरूप प्राप्त करना है। अभी मैं सुन रहा था बोलियां चढ़ती चढ़ती रुक जाती हैं। मैं सोच रहा था इनको चाबी नहीं मिल रही होगी या चाबी मिलने के बाद भी ताला खुल नहीं रहा होगा। कभी-कभी बहुत सारी चाबियां रहती हैं, तो ताला खोल नहीं सकते। प्रतिक्रमण पाठ में हमें पढऩे को उपलब्ध होता है। सभी ग्रंथियों को मैं छोड़ देता हूं निरग्रंथ अवस्था को प्राप्त करता हूं। इसके उपरांत में वस्त्र को छोड़ देता हूं और दिगंबरत्व को स्वीकार करता हूं महाराज दिगंबर अवस्था को प्राप्त कर गए। अभी यह शरीर यदि है तो उसे व्यर्थ ही जोड़ रखा है। एक उड़ा़ हुआ वस्त्र उतार देना दूसरा वस्त्र पहन लेना, लेकिन शरीर ही जब वस्त्र है, तो आज वह दिगंबर तो प्राप्त हुआ जो सिद्ध परमेष्ठी को प्राप्त हुआ है। अरिहंत परमेष्ठी भी अभी शरीर को ओढ़ कर रखे हैं। आज निर्वाण कल्याणक यहां कुंडलपुर में मनाया गया है। लेकिन भगवान की अनुपस्थिति में मनाया गया है। सब कल्याण शरीर सहित रहते थे तो उसी को हम लोग देख रहे थे। लेकिन जब प्राण आयु समाप्त हुआ, सिद्ध बनने के उपरांत ही वे पूज्यनीय हुए।
देवाविदेव १००८ भगवान आदिनाथ बड़े बाबा की पावन धरा कुंडलपुर मे जिनबिम्ब पंचकल्याणक महामहोत्सव के सानंद समापन हुआ है।
Recognize the nature of the soul and try to walk on the path of welfare: Acharyashree
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