जिन स्थानों पर बहा क्रांतिकारियों का लहू, वहां की धरती से आज भी आती है शहीदों के खून की महक

जिन स्थानों पर बहा क्रांतिकारियों का लहू, वहां की धरती से आज भी आती है शहीदों के खून की महक

Samved Jain | Updated: 16 Aug 2019, 12:58:38 PM (IST) Damoh, Damoh, Madhya Pradesh, India

दमोह जिले के कई शहीद ऐसे जिन्होंने गवाए अपने प्राण लेकिन नहीं मिली इतिहास में जगह,यह है नरसिंहगढ़ किला व फसिंया नाला का इतिहास,राजा ह्दय शाह ने की थी बुंदेलखंड में क्रांति की शुरुआत,लोकसभा में गूंजा शहीदों के सम्मान का मामला

दमोह. स्वतंत्रता दिवस पर देश के उन शहीदों को नमन किया जाता है जिन्होंने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध अपने प्राण गवां दिए। लेकिन इन्हीं शहीदों में दमोह संसदीय क्षेत्र के कई ऐसे शहीद भी हैं जिन्होंने देश के लिए अंग्रेजों से मुठभेड़ कर जान दे दी। लेकिन उन्हें देश के इतिहास में जगह नहीं मिली है। हम बात कर रहे हैं जिले के नरसिंहगढ़ के फसिंया नाला और सागर जिले की देवरी तहसील अंतर्गत फसिंया आम गांव की। नरसिंहगढ़ के फसिंया नाला में एक साथ 27 लोगों को अंग्रेजों ने मौत के घाट उतार दिया था जिनमें एक छह माह का बच्चा भी शामिल था। वहीं देवरी तहसील के क्षेत्र के 67 लोगों को फांसी के फंदे से लटकाकर मौत के घाट उतार दिया गया था जिनमें फसिंया आम के ११ लोग शामिल थे। लेकिन इनमें शामिल कई शहीदों के नाम सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं है।

लोकसभा में गूंजा शहीदों के सम्मान का मामला


दमोह सांसद व संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटैल ने संसदीय क्षेत्र के सभी शहीदों का नाम इतिहास में शामिल कराए जाने और जिन स्थानों पर यह शहीद हुए वहां शहीद स्मारक बनाए जाने की बात लोकसभा में उठाई। मंत्री प्रहलाद पटैल ने लोकसभा में बताया कि उन्होंने स्मारक बनाए जाने के लिए सांसद निधि से राशि देना चाहिए। लेकिन विडंबना यह बनी की स्मारक के नाम पर सांसद निधि से राशि नहीं दी जा सकी। उन्होंने लोकसभा में कहा इन शहीदों का नाम इतिहास में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि आज भी उन स्थानों की मिट्टी पर हमारे इन पुरखों की गंध आती है।

यह है नरसिंहगढ़ किला व फसिंया नाला का इतिहास


जबलपुर से मद्रास रेजीमेंट के मेजर किनकिनी अपनी पलटन को लेकर दमोह से होते हुए 17 सितंबर 1857 को नरसिंहगढ़ पहुंचे। जिन्होंने मराठा सूबेदार पं. रघुनाथ राव करमरकर के किले पर हमला कर उन्हें व उनके फडऩवीस रामचंद्र राव को पकड़ लिया व शाहगढ़ के राजा बखत बली के विद्रोही सैनिकों को अपने किले में शरण देने के कारण किले पर ही फांसी के फंदे से लटका दिया व उनके दीवान पं. अजब दास तिवारी सहित 18 परिजनों जिसमें छह माह का एक बच्चा भी था पकड़कर जन सामान्य को भयभीत करने 18 सितंबर को सबेरे नाला के किनारे लगे कोहे के पेड़ों से लटकाकर फांसी दे दी। तभी से इस नाला का नाम फसिंया नाला पड़ गया। इसी दौरान दमोह शहर की गजानन टेकरी के पीछे बालाकोट के जमींदार सोने सिंह व स्वरुप सिंह ने मराठा सूबेदार गोविंद राव का राजतिलक किया जिन्होंने तीन दिन दमोह पर शासन किया था जिन्हें बाद में अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। वहीं हिंडोरिया के किशोर सिंह ने दमोह की जेल पर हमला कर दिया व कं्रातिकारियों को छुड़ा लिया था व खजाना लूट लिया था इन पर व कारीजोग खेजरा के विद्रोही राठौर पंचम सिंह पर एक-एक हजार रुपए का इनाम घोषित कर तलाश शुरु कर दी थी।

राजा ह्दय शाह ने की थी बुंदेलखंड में क्रांति की शुरुआत


बुंदेला विद्रोह के नाम से इतिहास में दर्ज क्रांति के पूर्व तेजगढ़ के राजा ह्दयशाह ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की शुरुआत की थी। वह शुरुआती क्रांति के नायक थे। इस जानकारी से अवगत कराते हुए मंत्री प्रहलाद पटैल ने बताया कि राजा ह्दय शाह की गिरफ्तारी के बाद जब बुंदेलाओं को लगा कि अंग्रेजी सरकार द्वारा धोखा किया गया है। तब वह क्रांति में शामिल हुए और 1942 की क्रांति को बुंदेला विद्रोह का नाम मिला जिसकी शुरुआत राजा ह्दयशाह ने की थी। आज भी नरसिंहपुर जिले के हीरापुर में इनके वंशज रहते हैं। क्रांति के इस इतिहास के स्मरण के लिए तेजगढ़ में एक नाटक का आयोजन किया गया था जिनमें राजा ह्दय शाह के वंशज भी आए थे।

 

 

MP/CG लाइव टीवी

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned