बारिश में बह जाता है व्यारमा का पानी नहीं मिलता है लाभ

बारिश में बह जाता है व्यारमा का पानी नहीं मिलता है लाभ

Samved Jain | Updated: 16 Aug 2019, 01:18:24 PM (IST) Damoh, Damoh, Madhya Pradesh, India

बारिश बाद सूखी नजर आती है व्यारमा,राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में नहीं रुका पानी, बड़ी परियोजनाएं की ड्राइंग भी बनी लेकिन सभी ठंडे बस्ते में पहुंची

दमोह. सागर जिले से निकलकर पठारी इलाके तेंदूखेड़ा, जबेरा, पटेरा होते हुए हटा ब्लॉक तक व्यारमा नदी बहती है। व्यारमा नदी पहाड़ों से निकली नदी है इसलिए इसका 100 फीसदी पानी मिनरल वॉटर जैसा है, लेकिन यह पानी साल भर सहेजने के प्रयास नहीं किए गए हैं। वर्तमान में व्यारमा नदी पूरे वेग से बह रही है, लेकिन यह पानी केन नदी के माध्यम से जमुना नदी में मिल रहा है, जिसका लाभ दमोह जिले को नहीं मिल पा रहा है।

व्यारमा नदी का उद्गम सागर जिले की रहली तहसील की जोहरी टोरिया पहाड़ी से निकली है, जो उत्तर-पूर्व की ओर बहती हुई, हटा तहसील के खमरगौर गांव के पास सुनार नदी में मिल जाती हैं। यह नदी तेंदूखेड़ा ब्लॉक के तारादेही के बाद जबेरा ब्लॉक के नोहटा से होते हुए जबेरा ब्लॉक के नोहटा, बनवार, घटेरा होते हुए पटेरा ब्लॉक हरदुआ, कोटा, बर्रट, इमलिया होते हुए हटा ब्लॉक के बिजवार से होती हुई गैसाबाद के आगे खमरगौर में सुनार नदी में मिल जाती है। सागर से लेकर दमोह जिले के पहाड़ी क्षेत्रों होने वाली बारिश का पूरा पानी व्यारमा नदी में आता है, लेकिन इस अथाह जलराशि का संरक्षण न होने के कारण बारिश का सीजन खत्म होते ही व्यारमा नदी सूखी हुई नजर आती है।


स्टापडैम भी नहीं रोक पाते हैं पानी
व्यारमा नदी पर दसौंदी, कनियाघाट, गोपालपुरा, जुझारघाट, घाट पिपरिया सहित 15 से अधिक अधिक स्टापडैम बनाए गए हैं, लेकिन इन स्टापडैमों में कड़ी शटर न लगने और कई जगह रिसाव होने के कारण भी बारिश का पानी नहीं रुक पाता है। जिससे नदी सूखी हुई नजर आती है। हालांकि जुझारघाट के पास बनाए गए स्टापडैम में पानी संरक्षित रहता है, जहां से दमोह शहर को पानी उपलब्ध कराने के लिए जुझारघाट परियोजना के तहत इंटकवेल बनाया गया है।


अभ्यारण्य व मगरमच्छ बने बाधा
व्यारमा नदी का पानी संरक्षित करने के पहले नोहटा डैम साइड का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था, जिसमें 22 गांव डूब में आ रहे थे। इस प्रोजेक्ट की फाइलें भी चलीं, लेकिन वन विभाग की आपत्ति के कारण यह प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में चला गया था। वन विभाग ने नौरादेही अभ्यारण्य, मगरमच्छ संरक्षण के लिए व्यारमा के तट को आरक्षित किया गया है। उस दौरान योजनाकारों ने वन विभाग को ही इस प्रोजेक्ट पर काम करने की सलाह दी थी, ताकि वन प्राणियों के लिए भी पानी उपलब्ध हो सके और वन विभाग उसका राजस्व भी वसूल सकता है, लेकिन इस प्रोजेक्ट पर ध्यान नहीं दिया गया। जिससे यहां पानी नहीं रुका।


नदियों के लिंक करने की योजना भी फेल
अटल सरकार के समय नदियों को लिंक करने की योजना थी। बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण ने बुंदेलखंड में तत्तकालीन अध्यक्ष डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया ने एक प्रस्ताव तैयार कराया था, जिसमें सुनार, व्यारमा, कोपरा, धसान व बेबस नदियों को नर्मदा से लिंक करने का प्रस्ताव कर राज्य शासन को भेजा गया था, लेकिन यह प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में चला गया।


बनी है 17 हजार करोड़ की परियोजना
व्यारमा नदी का पानी सहेजने के लिए तत्कालीन भाजपा सरकार ने 17 हजार करोड़ रुपए की ड्राइंग तैयार कराई थी। प्रोजेक्ट की ड्राइंग डिजाइन के हिसाब से दमोह जिले के पटेरा और कुंडलपुर के आसपास इस प्रोजेक्ट पर ज्यादा काम होना था। इन्हीं क्षेत्रों में डेम भी बनने थे और डूब क्षेत्र में आने वाले ग्रामीणों को विस्थापित भी किया जाना था। यह परियोजना दमोह की व्यारमा नदी, सुनार नदी और पन्ना की पतने नदी पर आकार लेना थी। जिसकी डीपीआर तैयार कर शासन के पास भेजी गई है, लेकिन वहां ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है।


व्यारमा को उपेक्षित किया गया
व्यारमा नदी के किनारे रहने वाले राजकुमार सेन कहते हैं कि जबेरा व तेंदूखेड़ा क्षेत्र को पिछले 15 सालों में राजनीतिक प्रतिद्वंदता की वजह से उपेक्षित किया जाता रहा है। जिस वजह से सुनार व बेबस नदी पर पंचमनगर, साजली, सीतानगर परियोजना व दमोह में सतधरू परियोजना शुरू की गई है, लेकिन व्यारमा नदी पर कोई बांध नहीं बनाया गया है। राजेंद्र राठौर का कहना है कि व्यारमा नदी का पानी गुणवत्ता युक्त है, क्योंकि इसके किनारों पर किसी प्रकार प्रदूषण नहीं है, प्राकृतिक पहाड़ों से कलकल बहती नदी का पानी पीने योग्य है, लेकिन दमोह जिले के राजनीतिकों की इच्छा शक्ति न होने से हर साल व्यारमा नदी का पानी बारिश में बहकर, उत्तरप्रदेश को लाभांन्वित करने हमारे सामने से बह जाता है। बद्री मिस्त्री का कहना है कि चुनाव के पहले पटेरा में परियोजना की बात सुनी थी, अधिकारियों ने दौरे भी किए थे, कुछ गांवों को विस्थापित भी किया जाना था, लेकिन उस पर भी कुछ काम नजर नहीं आ रहा है।


वर्जन
व्यारमा नदी का पानी रोकने के लिए प्रस्ताव भोपाल में लंबित हैं। जिनकी उच्चस्तरीय मंजूरी होने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। अभी केवल साजली व सतधरू पर काम चल रहा है, लेकिन बजट का अभाव है।
एसके जाटव, इइ, जलसंसाधन विभाग दमोह

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