जहां होती थी ओली वहां हो रहे विवाह

अस्थियां विसर्जित हो रहीं मढ़कोलेश्वर संगम में

By: Rajesh Kumar Pandey

Published: 21 May 2020, 06:06 AM IST

दमोह. लॉक डाउन ने विवाह को सीमित कर दिया है, लोगों के जिन कमरों, या हॉल में लड़की की ओली होती थी, आज वहीं हरा मंडप बनाकर के सात फेरे कराए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अंतिम संस्कार में लोग अस्थियां विसर्जित करने प्रयागराज संगम जाते थे, लेकिन लॉकडाउन में मढ़कोलेश्वर संगम जा रहे हैं। यहां तक बरमान घाट भी नरसिंहपुर कलेक्टर ने बुंदेलखंड के लोगों के लिए बंद कर दिया है।
कोरोना संक्रमण काल में महामारी से बचाव के लिए शासन द्वारा विवाह में 20 लोगों की बाध्यता की गई है। वर्तमान में जितने भी विवाह हो रहे हैं। वह घरों के कमरों में हो रहे हैं। रात में धूमधाम से निकलने वाली बारात, मंचीय कार्यक्रम, डीजे का शोर, बैंडबाजे, घुड़बग्गी और आसमान में आतिशबाजी के धमाकों अभी थमे हुए हैं। दुल्हन का घंटों ब्यूटी पार्लर में संजना संवरना बीते कल की बातें हो गई हैं। सैकड़ों लोगों का बफर में शामिल होना पुरानी यादें बनकर रह गई हैं। धूमधाम से होने वाले विवाह में 5 से लेकर हैसियत के मुताबिक करोड़ रुपए तक खर्च किए जाते थे। वर्तमान में हो रहे विवाह सीमित खर्च में हो रहे हैं।
जेवर का चढ़ाव में ही हो रहा खर्च
वर्तमान में हो रहे विवाहों में शानशौकत के लिए की जाने वाली विवाह की फिजूलखर्ची थम गई है, सोना महंगा होने के कारण वर्तमान में हो रहे विवाह में हैसियत के मुताबिक वधू को चढ़ाव चढ़ाया जा रहा है, जिसमें सोने के जेवर शामिल होते हैं, लेकिन अब इसमें भी कमीं देखने आ रही है। सराफ व्यवसायियों की मानें तो अभी जितने विवाह हो रहे हैं, उनमें सोने के जरूरी जेवर जैसे मंगलसूत्र, बेंदी, चांदी के डोरा (करधन) पायलों की मांग हो रही है। सोने का हार, कंगन कुछ लोग चढ़ा रहे हैं, लेकिन इनका वजन अब हल्का हो गया है। जिससे वर्तमान में हो रहे विवाहों केवल सोने में ही खर्च किया जा रहा है, शेष खर्च के लोगों के बच रहे हैं, जिससे वर्तमान में जितने भी विवाह हो रहे हैं वह बचत के विवाह ही हो रहे हैं।
पांव पखरई भी हो गई सीमित
बुंदेलखंड में विवाह की परंपरा में वर-वधू के हल्दी से पांव पखारने की परंपरा भी है, कोरोना संक्रमण में बीमारी फैलने के कारण लोगों से दूरी बनाए रखने के लिए अब पांव पखारने की परंपरा लड़की के माता-पिता तक ही सीमित हो गई है। क्योंकि विवाह में ज्यादा लोगों को अनुमति न मिलने से अन्य रिश्तेदार भी नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिससे अधिकांश परंपराओं को घर के सदस्य ही निभा रहे हैं।
एक ब्राह्मण तक सीमित हो गई तेरहवीं
अंतिम संस्कार में मुक्तिधाम में जहां 20 लोगों के शामिल होने की अनुमति है। वहीं खारी उठाने के बाद अस्थियां प्रयागराज इलाहाबाद ले जाने के बजाए मढ़कोलेश्वर में कोपरा-सुनार के संगम में ही विसर्जित की जा रही हैं। अस्थियां विसर्जित करने के लिए बरमान की अनुमति मांगी गई यहां के प्रशासन ने अनुमति भी दी, लोग बरमान टोल तक अस्थियां लेकर पहुंचे भी, लेकिन नरसिंहपुर कलेक्टर ने किसी को प्रवेश नहीं दिया, जिससे वापस लौटकर दमोह के लोगों ने मढ़कोलेश्वर में ही अस्थियां विसर्जित कीं। तेरहवीं संस्कार में जहां 13 ब्राह्मणों को भोज कराकर दान दक्षिणा दी थी, वर्तमान संक्रमण काल में एक पंडित तक सीमित हो गई है। ज्यादा लोगों की भीड़ न लगाते हुए लोग ब्राह्मणों के घर सामग्री पहुंचाकर तेरहवीं संस्कार पूर्ण कर रहे हैं। वर्तमान में जितने भी तेरहवीं संस्कार हुए हैं, उनमें बाहर रहने वाले नाते-रिश्तेदार भी दूरी बनाए हुए हैं। जिस अंतिम संस्कार पर होने वाला इलाहाबाद तक का परिहवन का खर्च बच रहा है। तेरहवीं पर होने वाला खर्च भी सीमित हो गया है।

 
Rajesh Kumar Pandey Desk
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