टूटा रिकॉर्ड--70 साल बाद गांव में कोई मैट्रिक पास, दो बच्चियों ने रचा इतिहास

टूटा रिकॉर्ड--70 साल बाद गांव में कोई मैट्रिक पास, दो बच्चियों ने रचा इतिहास
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| Publish: Jun, 28 2018 05:30:24 PM (IST) Darbhanga, Bihar, India

जिले के बहादुरपुर प्रखंड में एक ऐसा भी गांव है, जहां 70 साल में कोई पहली बार मैट्रिक पास कर सका

(प्रियरंजन भारती की रिपोर्ट)
दरभंगा। जिले के बहादुरपुर प्रखंड में एक ऐसा भी गांव है, जहां 70 साल में कोई पहली बार मैट्रिक पास कर सका। खेती, मजदूरी और छोटे धंधे करने वालों के इस गांव में आज भी शिक्षा और विकास के साधनों का घोर अभाव है। दरअसल, बहादुरपुर प्रखंड के घोसलावर गांव में आजादी के बाद कोई मैट्रिक पास नहीं कर सका। पढ़ने को तो बहुतों ने पढ़ाई की, पर सभी मैट्रिक फेल होकर ही रह गए। अधिकांश लोगों ने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। गांव की नेहा और पूजा नाम की बेटियां इस बार मैट्रिक परीक्षा पास कर गांव का पुराना इतिहास तोड़ने में अव्वल रहीं। वह भी तब जब इन्होंने परिवार वालों पर अपनी जिद जबरन थोपी थी। दोनों के मैट्रिक पास होने से गांव में जश्न सा माहौल है। सभी बेहद खुश हैं।

 

बेटी ने वह कर दिखाया जो आज तक यहां कोई नहीं कर सका

 

नेहा के पिता देवन सहनी की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं है। डबडबाई आंखों से खुशियां उड़ेलने का अहसास कराते कह पड़ते हैं कि बेटी ने वह कर दिखाया जो आज तक यहां कोई नहीं कर सका। वह बेटी नेहा की सफलता पर ऐसे इतरा रहे, मानो वाकई चांद आंगन उतर आया हो। नेहा अपने मिशन की चमक वाली आंखों से सब कुछ निहारती हुई जिम्मेदारियों के साथ कहती है कि वह शिक्षक बनना चाहेगी, ताकि कोई बिना पढ़े न रह जाए। नेहा कहती है कि बिना पढ़ाई के हम दुनिया से बहुत पीछे रह जाते हैं। पूजा ने भी मैट्रिक पास कर गांव का नाम रौशन किया है। उसके घर में भी खुशियां झूम रही हैं। रिश्तेदारों का आना-जाना बढ़ गया है। पूजा पढ़कर अफसर बनना चाहती है। वह चाहती है कि गांव क्या पूरे क्षेत्र में खूब विकास हो और सभी खुशहाल रहें।

 

गोसलावर में नहीं स्कूल


नेहा और पूजा ने गांव के इतिहास तो बदल डाले, पर इन दोनों की लगन और निष्ठा की भी दाद देनी होगी। दोनों के साथ और भी लड़के लड़कियां पढ़ने जाती रहीं, पर परंपरागत तरीकों से अलग हटकर नहीं। कईयों ने स्कूल जाना बीच में ही छोड़ दिया। महत्वपूर्ण यह है कि ये बच्चियां तीन किलोमीटर चलकर आनंदपुर हाईस्कूल में पढ़ने जाती रहीं। इसे मिशन की तरह मानकर कभी स्कूल जाना नहीं छोड़ा। गांव में हाईस्कूल क्या कोई मिडल और प्राथमिक स्कूल भी नहीं है। ज्यादातर खेती, मजदूरी और छोटे मोटे रोजगार करने वाले बारह सौ लोगों के इस गांव में विकास की फैलती
बांहें नहीं पहुंची हैं। नतीजन लोग आज भी जिस हाल में हैं वैसे ही रहने को मजबूर नज़र आते हैं। आसपास के गांवों का भी अमूमन एक जैसा हाल है। सुबह उठते बच्चों समेत पूरा परिवार रोजी रोजगार के कामों में खपने निकल पड़ता है।

 

पापी पेट के सवाल के आगे


अभिभावक भी खुश रहते हैं कि बच्चे उनका हाथ बटा रहे। बच्चों की इच्छा और लगन की परवाह कोई कर भी नहीं पाता। ऐसे गांवों और इलाकों में नीतीश कुमार के सुशासन के दावों की कलई पूरी तरह खुल जाती है जहां इस सदी में भी बासिंदे खुशहाली के लिए तरस रहे ह़ैं।

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