गुरु ही परमात्मा से मिलने का द्वार है : मुनिश्री

पुष्पदंत सागर सभागृह में धर्मसभा को किया संबोधित

दतिया. जगत में दो ही लोग ऐसे होते हैं जिनका दिल अपनी संतान को बढ़ता हुआ देखकर प्रसन्न होता है। पिता और गुरू का दिल। पिता के अरमान आकाश से भी ऊंचे होते है और मां की ममता पृथ्वी से भी भारी होती है। माता-पिता और गुरू की कृपा हमेशा बनी रहना चाहिए। भगवान अगर एक बार रूठ जाएं तो इतना घबराने की आवश्यकता नहीं है। मगर गुरु कभी नहीं रूठना चाहिए, क्योंकि गुरू ही परमात्मा से मिलने का द्वार है। उक्त विचार क्रांतिकारी मुनिश्री प्रतीक सागर जी महाराज ने शुक्रवार को सोनागिर स्थित आचार्यश्री पुष्पदंत सागर सभागृह में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।


उन्होने कहा कि क्रोध धर्म निरपेक्ष है, सभी को आता है, मगर याद रखें, क्रोध करने के बाद बैर कभी न पालें। गुस्सा करना दुर्भाग्य है, प्रेम करना सौभाग्य। गुस्से में आपके कारण किसी की आंखो से आंसू आते है पर प्रेम में आपके लिए दूसरों की आंखो में आंसू आते है। सप्ताह में सात दिन होते है। अगर सोमवार को गुस्सा आए तो अपने आपसे कहिए आज तो सोमवार है सप्ताह की शुरूआत कलह से न हो, मंगलवार को यह सोचकर गुस्सा मत करिए कि मंगल को कौन सा अमंगल, बुधवार को युद्ध क्यों करें, गुरूवार को सोचो आज तो गुरू का दिन है, शुक्रवार को शुक्रिया अदा करने का वार है, शनिवार को भूल से भी गुस्सा मत करिए, शनि की महादशा लग जाएगी, रविवार छुट्टी का दिन है आज गुस्से की छुट्टी है। जिंदगी में हमेशा दिमाग को ठण्डा रखिए, आंखो में शर्म रखिए दिल में रहम और जुबान को नरम रखें। यह सूत्र जिंदगी के लिए आनंददायी है। मुनिश्री ने आगे कहा कि क्रोध को अपने जीवन का हिस्सा मत बनाइए। यह एक ऐसी आग है जो जलती तो दूसरे को जलाने के लिए पर अंतत: स्वयं को ही जला बैठती है। यह चिंगारी की तरह उठती है पर ज्वालामुखी की तरह धधकती है। कभी भी कोई भी निर्णय गुस्से में न लें। बाप भी अगर गुस्से में आकर बेटे को घर छोडऩे के लिए कहे तो बेटा घर छोड़कर न जाए, क्योंकि उस समय बाप नहीं बोल ररहा है, बाप के अंदर क्रोध रूपी शैतान बोल रहा है। मजे की बात तो यह है हर क्रोध करने वाला गुस्सा करने के बाद पश्चाताप से भर जाता है। इसीलिए तो कहा है क्रोध तात्कालिक पागलपन है, जो आदमी की बुद्धि और विवेक को समाप्त कर देता है। माता-बहनों को क्रोध के समय न भोजना बनाना चाहिए और न स्वयं करना चाहिए न अन्य को खिलाना चाहिए। क्रोध के समय बनाया गया भोजन विषाक्त हो जाता है।

महेंद्र राजोरे Desk
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