पुण्य की संपदा जीवन की सबसे बड़ी संपदा है : मुनिश्री

मुनिश्री का 22वां चातुर्मास मंगल कलश स्थापना के साथ हुआ शुरू

दतिया. सोनागिर सिद्ध क्षेत्र पर क्रांतिवीर मुनिश्री प्रतीक सागरजी महाराज का 22वां भव्य पुष्प चातुर्मास मंगलवार को मंगल कलश स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ। चातुर्मास मंगल कलश स्थापना महोत्सव का आयोजन अमोल वाली धर्मशाला में किया गया।


महोत्सव के प्रारंभमें मंगल कलश लेकर महिलाएं बैंड बाजे के साथ निकली। कलश यात्रा का जगह-जगह स्वागत किया गया। शोभायात्रा दोपहर 2 बजे कार्यक्रम स्थल पर पहुंची जहां मंत्रोच्चारण के साथ ध्वज फहराया गया। मंगल गीत गाए गए। तत्पश्चात् आचार्य संघ, मुनि संघ आर्यिका संघ मंच पर विराजमान हुए। मंगलाचरण आर्यिका प्रसन्न मति मातादी द्वारा किया गया। नृत्य की प्रस्तुति मुस्कान जैन शालिनी जैन ने दी। महोत्सव में गरिमामय उपस्थिति मुनिश्री के अलावा आचार्य धर्मभूषण महाराज की रही। आचार्य पुष्पदंत सागर जी का चित्र अनावरण, दीप प्रज्जवलन, पाद प्रक्षलन, शास्त्र भेंट एवं महाआरती भक्तों द्वारा की गई।


22 परिवारों ने किया मंगल कलश स्थापित


चातुर्मास समिति के प्रचार संयोजक सचिन जैन आदर्श कलम ने बताया कि चातुर्मास मंगल कलश स्थापित करने का सौभाग्य 22 परिवारों को प्राप्त हुआ।भट्टाराक कोठी एवं सकल दिगंबर जैन समाज दिगंबर जैन जागरण युवा संघ, ग्रेटर ग्वालियर द्वारा 2020 का पालन चातुर्मास सोनागिर में करने की मुनिश्री से प्रार्थना और अनुनय विनय किया गया। तत्पश्चात मुनिश्री ने मंगल द्रव्य चावल, पीली सरसों, सुपारी, नवग्रह की शांति के लिए नवरत्न, रोग शोक को दूर करने के लिए कपूर, लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए काली हल्दी, इलायची, लोंग, सिक्के आदि मंत्र उच्चारण पूर्वक कलश में विराजमान करवाए तथा 35 किलोमीटर की छूट रखकर चातुर्मास सोनागिर में करने का सिद्ध भक्ति, योगभक्ति, समाधि भक्ति पढ़कर संकल्प लिया। मुख्य चातुर्मास कलश स्थापित करने का सौभाग्य दिगंबर जैन जागरण युवा संघग्रेटर ग्वालियर को प्राप्त हुआ।


मुनिश्री ने दिए प्रवचन


मुनिश्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वर्षा योग काल में अनेकों धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से पुण्य कमाने का अवसर प्राप्त होता है और पुण्य ही अरिहंत पद को प्रदान करता है। धन संपदा तो क्षणभंगुर है मगर पुण्य की संपदा दुनिया की सबसे बड़ी संपदा है। जिसे पाकर जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने आगे कहा कि चातुर्मास श्रवण और श्रावक को बंधन में बंद कर संयम के मार्ग उत्तरोत्तर बढऩे का समय है। इसलिए इस वर्षा योग भी कहते है। पानी के इक_ा होने पर जमीन की प्यास बुझ जाती है और चातुर्मास में गुरू के चरणों में बैठकर ज्ञान की आराधना करने से मन के अंदर से कषायों का मेलधुल जाता है। चातुर्मास चतुर लोगों के लिए है जो तीतर से तीर्थंकर बनना चाहते है कंस से परमहंस बनना चाहते है नर से नारायण बनना चाहते है। वह ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाते है संयम और आचरण से अपने जीवन का श्रृंगार करते है। उनका जीवन तीर्थ की तरह पवित्र हो जाता है। मुनिश्री ने आगे कहा कि जीवन में तमाशा जरूर देखें मगर जिंदगी को तमाशा न बनने दें जो लोग जिंदगी को तमाशा बना लिया करते है उनकी जिंदगी अभिशाप बन जाती है। जिंदगी को उपहार और वरदान बनाने का पुरूषार्थ करना चाहिए। जिससे यह छोटा सा जीवन आने वाले भविष्य का सुंदर निर्माण कर सके। कार्यक्रम के अंत में मुनिश्री की दीपों से मंगल आरती की गई।

महेंद्र राजोरे Desk
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