Video: दौसा में बुने कपड़े का लहराया था लालकिले की प्राचीर पर पहला तिरंगा

दौसा के बुनकरों ने देश में बढ़ाया मान, अब देश में हुबली, बनेठा एवं मराठवाड़ा में ही बुना जाता है झण्डा क्लोथ

By: gaurav khandelwal

Published: 26 Jan 2018, 09:17 AM IST

दौसा. जिला मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर दूर छोटे से गांव बनेठा ने दौसा का नाम पूरे देश में रोशन कर रखा है। यहां का बुना कपड़ा देशभर में लहराए जा रहे तिरंगे के काम आ रहा है। हालांकि देश में यहां के अलावा कर्नाटक के हुबली एवं महाराष्ट्र के मराठवाड़ा मेंभी कुछ बुनकर झण्डा क्लोथ तैयार कर रहे हैं।

 

लेकिन दौसा का सौभाग्य हैकि देश की आजादी के समय 1947 में दिल्ली के लालकिले की प्राचीर पर जो पहला तिरंगा लहराया था उसका कपड़ा दौसा के आलूदा गांव के चौथमल व नानगराम महावर ने बुना था। सूत्रों की माने तो आज भी यह झण्डा दिल्ली में सुरक्षित रखा हुआ है। आज देश में गणतंत्र दिवस एवं स्वतंत्रता दिवस पर देशभर में जो तिरंगा लहराया जाता है उसमें दौसा जिले के बनेठा गांव के बुनकरों का बड़ा ही योगदान है।

 

 

नहीं हो रहा है विकास
दौसा पंचायत समिति के बनेठा गांव में संकरे व कीचडय़ुक्त रास्तों में प्रवेश करने पर छोटे-छोटे मकान व उनमें लगे हथ करघे नजर आएंगे। इस तंग बस्ती में वे हीरे (कारीगर) वास करते हैं, जो भारत के राष्ट्रीय ध्वज का कपड़ा बुनते हैं। वर्षों से यहां के कारीगर देश के लिए तिरंगे का कपड़ा (झण्डा क्लोथ) बुन रहे हैं, लेकिन उनकी आर्थिक, शैक्षिक व कॉलोनी विकास की स्थिति बदतर है।

 

उनके बालकों को कोई खास सुविधा नहीं मिल रही है और नहीं उनको भी खादी की ओर से कोई खास सुविधाएं नहीं मिल रही है। यहां पर 14 परिवार इस कपड़े की बुनाई में सालभर लगे रहते हैं। पत्रिका टीम ने जब यहां के कारीगरों से तिरंगे का कपड़ा बुनने के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उनके गांव में बुना झण्डा क्लोथ पूरे देश में तिरंगे के रूप में शान से लहराया जा रहा है।

 

बुनकरों ने बताया कि उनको गर्व है कि वे उनका बुना कपड़ा देश के तिरंगे के काम का आ रहा है। लेकिन कारीगरों ने दबे स्वर में कहा कि वे जब से खादी का कपड़ा बुन रहे हंै तब भी उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी थी और आज भी उसी स्थिति में है। गौरतलब है कि दौसा खादी समिति के अधीन थूमड़ी, छारेड़ा, कालीखाड़, रजवास, नांगलराजावतान, दौसा व आलूदा में भी बुनकर है, लेकिन यहां झण्डा क्लोथ सिर्फ बनेठा में ही बुना जाता है।

 

 

आलूदा पर नहीं दिया ध्यान
भारत की आजादी के बाद पहली बार दिल्ली के लालकिले की प्राचीर पर जो तिरंगा लहराया था, वह कपड़ा दौसा के आलूदा गांव के भौंरीलाल महावर, चौथमल व नानगराम ने बुना था। यानि उस समय तिरंगे के लिए देशभर की कई खादी समितियों से कपड़ा गया था, लेकिन चुनाव आलूदा के कपड़े का ही हुआ था। आज स्थिति यह है भौंरीलाल व उसके भाई तो नहीं है, लेकिन खादी की ओर से संरक्षण नहीं मिलने से उनके परिवार तक ने खादी से मुंह मोड़ लिया। जगदीश महावर व पूर्व सरपंच जुगल मीना ने बताया कि यदि सरकार आलूदा में ध्यान देती तो लोगों को रोजगार मिलता।

 

इसलिए बनेठा में बुनता है झण्डा क्लोथ


बनेठा में तिरंगा का कपड़े बुनने वाले मूलचंद महावर ने बताया कि उनको जब से याद आती है उनके गांव में तिरंगे का कपड़ा बुना जाता है। पहले आलूदा में भी बुना जाता था। उनको दौसा खादी भण्डार से कच्चा सूत मिलता है। वें यहां पर पानी में गेहूं का आटा मिला कर उसमें इस सूत को मिला कर सुखाते हैं। इससे कपड़े में निखार आता है। सूत्रों की माने तो यहां के पानी भी खासियत है कि जिसमें गेहूं का आटा मिलाने के बाद सूत को भिगोया जाता है तो इस कपड़े में अलग ही निखार आता है।

 

फिर भी वे बुनते हैं झण्डा क्लोथ
बनेठा निवासी किशोरी लाल महावर ने बताया कि उनके परिवार में कई वर्षों से इस कपड़े को बुना जा रहा है। हालाकि उनको कपड़े की बुनाई में कोई खास आमदनी नहीं होती है, फिर भी इस बात पर गर्व है, कि उनका बुना कपड़ा देश की शान है। उन्होंने बताया कि साढ़े 15 मीटर लम्बे कपड़े का थान बुनने में उनको करीब ढाई सौ रुपए मिल पाते हंै। एक थान कपड़ा दो दिन बिना नहीं बुना जा सकता है। इसलिए वे कपड़ा बुनाई के साथ-साथ दूसरा काम भी करते हंै ताकि खर्चा चलता रहे।

 

 

आधुनिकतता में भी पुराने औजार
बनेठा में जो कारीगर झण्डा क्लोथ तैयार कर रहे हैं उनको भी हथ करघा हाथ से ही चलाना पड़ रहा है। जबकि इस आधुनिकता में उनके लिए कपड़ा बुनने के लिए नए करघे आने चाहिए। नहीं उनको किसी प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे की उनके काम में और निखार आए।

gaurav khandelwal Desk
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