आन, बान व शान की पहचान गढ़हिम्मतसिंह किला

इतिहास की दास्तां समेटे हुए है किला
किले में है अभेद दीवार

By: Mahesh Jain

Published: 25 Apr 2018, 12:38 PM IST

मंडावर. गढहिम्मतसिंह का किला आज भी अपनी आन,बान व शान के रूप में पहचान बनाए हुए हैं। यह सब किले की उचित देखरेख के कारण संभव हो सका है। इसके चलते किला आज भी पूरी चमक के साथ अपनी दास्तान कह रहा है। गढहिम्मतसिंह किले के पृथ्वीराज सिंह ने बताया कि यह किला कच्छावा वंश के नरूका गोत्र के गढ़ीसवाईराम से आए हिम्मतसिंह ने बनवाया था और गढ़ मतलब ठिकाना और हिम्मतसिंह मतलब राजा के नाम से आज गढहिम्मतसिंह कस्बा बसा हुआ है।

 

जहां गढहिम्मतसिंह कहने को तो छोटा सा कस्बा है लेकिन इसकी बसावट जयपुर शहर जैसी है। जो कि राजा हिम्मतसिंह के कारण उस समय के इंजीनियरों द्वारा संभव हो सकी थी। गांव की प्रत्येक गली मुख्य सड़क पर आकर रुकती है। जो कि जयपुर की बसावट की तरह नमूना है।

जयपुर राजघराने के अधीन था किला
गढ़ हिम्मतसिंह का यह किला जयपुर राजघराने के अधीन था और यहां की सेना जयपुर राजघराने के अधीन दुश्मनों से युद्ध लडऩे जाया करती थी। गढ़हिम्मतसिंह किले को जब विजयसिंह ने संभाला तो उनकी उम्र मात्र चौदह वर्ष थी, लेकिन उनकी सोच बड़ी थी।

रिंग पैलेसे में तैयार होती थी रणनीति
किले के अन्दर सीक्रेट कांफ्रेस रूम अर्थात रिंग पैलेस बनवाया। जिसमें डबल दीवार बनवाई गई थी। दो दीवार होने के कारण इस रिंग पैलेस में युद्ध को लेकर रणनीति बना कर गुप्त बैठकें आयोजित की जाती थी। किले के अंदर ही एक सुरंग बनी हुई है। उस सुरंग के अन्दर भी एक कच्ची सुरंग बनी हुई है, लेकिन वे सुरंग कहां जाती है इसका अंदाजा उनको भी नहीं है। विजयसिंह युद्ध कौशल में निपुण थे। जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संवत 1813 में भौमगढ़ मराठों से जयुपर राजघराने का युद्ध हुआ था। जिसमें विजयसिंह ने अपनी बहादुरी दिखाई थी। इसके चलते जयपुर घराने के महाराज सवाईमाधोसिंह ने दस हजार रुपए नेद व ग्राम कैमला सहित पांच गांव जागीर इनायत की।

किले के बीचों-बीच रखी है भवानी तोप
किले के बीचोंबीच भवानी तोप रखी हुई है। जो वर्ष 1888 में बनी थी और अष्ठधातु से निर्मित होने के कारण आज तक बिना जंग लगे सुरक्षित है। किले के समीप ही विजयसिंह द्वारा निर्मित विजयसागर कुंआ स्थित है। उस समय इस कुएं में सात चरस दिन-रात चलते थे और फसलों को पानी लगता था, लेकिन कभी पानी नहीं टूटा। किले में रह रही पीढ़ी ठाकुर हिम्मतसिंह की सत्रहवीं पीढ़ी है और किले में रह रहा परिवार अब पर्यटन क्षेत्र से जुड़ चुका है।

विदेशी पर्यटकों को कराते हैं रूबरू
किले में आने वाले विदेशी पर्यटकों को ग्रामीण सभ्यता से रूबरू कराकर किले में ही बने कमरों में ठहराया जाता है। साथ ही किले में ठाकुर विजयसिंह को भौमिया के रूप में पूजा जाता है। इस स्थान पर आकर स्थानीय निवासी सहित बाहर से ग्रामीण मन्नत मांगने आते हैं। मन्नत पूरी होने पर प्रसादी वितरण का आयोजन किया जाता है।

Identification of Historical Garhidamasinh Fort
Mahesh Jain Bureau Incharge
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