कपास के बंपर उत्पादन के बाद भी किसान निराश, मंडियां बंद होने से नहीं मिल रहा उचित दाम

सैकड़ों क्विंटल कपास आज भी रखा है किसानों के घरों में

By: Chandraprakash Sharma

Published: 10 May 2020, 06:19 PM IST

देवास/पानीगांव। इस बार क्षेत्र के आदिवासी अंचल में कपास का बंपर उत्पादन हुआ है, कपास के रकबे में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, किंतु कपास मंडियां बंद होने से व्यापारी किसानों से ओने पौने दामों में कपास खरीद रहे हैं। वही बेबस किसान इस औने पौने दामों में कपास विक्रय को कतई तैयार नहीं है। वही मजबूरीवश कई किसानों को बाजार में कम मूल्य ही कपास पर बेच दिया जिससे न तो उनका लागत मूल्य निकला और न ही कर्ज की अदायगी कर पाए।
क्षेत्र के आदिवासी किसान यदि वह वर्तमान बाजार मूल्य पर कपास बेचते है तो विक्रय दाम इतना कम है कि उनका लागत मूल्य भी नहीं निकल पाएगा। क्षेत्र के कई किसान मजबूरी में अपना सफेद सोना कम दाम में ही व्यापारियों को बेच चुके, जिन किसानों ने मजबूरीवश व्यापारियों को कपास विक्रय कर दिया है उन्हें बहुत बड़ी आर्थिक क्षति हुई है। उनके कर्ज की अदायगी तक नहीं हुई है। क्षेत्र में कपास की लोहारदा एवं कांटाफोड़ में ही मंडियां हैं, किंतु कोरोना महामारी के चलते मंडियां बंद है और इसका फायदा बाजार के व्यापारी उठा रहे हैं।
खड़ा हो जाएगा रोजी-रोटी का संकट - यदि यही स्थिति रही तो आदिवासी किसानों का न केवल कपास से मोहभंग हो जाएगा बल्कि हताश किसानों के सामने रोजी.रोटी का बड़ा संकट भी खड़ा हो जाएगा। व्यापारियों द्वारा किसानों से इतने कम दामों पर कपास खरीदा जा रहा है कि इन दामों पर न तो उसकी उत्पादन लागत निकल पा रही है और न ही परिवहन लागत, ऐसी स्थिति में किसान अपना कर्ज पटाने में बेबस और असहाय नजर आ रहे है।
किसानों के घर मिली सैकड़ों क्विंटल कपास
पत्रिका ने जब पड़ताल की तो क्षेत्र के कई आदिवासी गांवो में सैकड़ों क्विंटल कपास आज भी किसानों के घरों में रखा हुआ है। कपास इस भीषण गर्मी के दौर में किसी बारूद से कम नहीं है। अपने सफेद सोने को घर में रखकर बैठे किसानों के समक्ष दोहरी चुनौती है एक तो उसे सही दामों में विक्रय करना और दूसरा घर में रखे कपास को इस भीषण के गर्मी के दौर में आग से बचाना। जरा सी असावधानी किसानों की पसीने की कमाई को खाक में मिला सकती है। खेरी, मुहाडा, रामटेक, बड़ी कराड सहित अनेक ऐसे आदिवासी गांव हैं जहां इस बार कपास का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन हुआ है। लेकिन क्षेत्र में कपास विक्रय की मंडियां बंद पड़ी हुई है। कन्नौद तहसील की बावड़ी खेड़ा ग्राम पंचायत का बडीकराड मजरा तहसील का एक मात्र ऐसा मजरा है जो कपास के पैदावार उत्पादन मे कन्नौद तहसील मे पहले स्थान पर है, यहां के किसानों के घरों में चार सौ से पांच सौ क्विंटल कपास विक्रय हेतु रखा है लेकिन मंडी बंद होने से उचित दाम नहीं मिल रहे हैं, इससे किसान न केवल बुरी तरह परेशान है, बल्कि उन्हें कई प्रकार की मानसिक एवं आर्थिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है। इस चिलचिलाती गर्मी मे कपास को घर में रखकर मानो किसान अपने कच्चे घरों मे बारूद रख रहा है, यदि गलती से कही आग की चिंगारी लगी की तो किसानों की सारी मेहनत खाक में मिल जाएगी। बड़ी कराड के आदिवासी किसान लकड़ीया, फुगरिया,मायाराम, राहुल बारेला, ईर सिंग, रामलाल, कमल गेंदालाल पटेल, चैनसिंह शांतिलाल, दोला पटेल, भारसिंह बामनिया सहित कई किसान है जो अपने घरों में कपास रखकर मंडी खुलने व सही दाम मिलने के इंतजार में बैठे हैं। यही स्थिति ग्राम मवाड़ा की है।
नीलामी के माध्यम से विक्रय होता था कपास
क्षेत्र में कपास की केवल लोहारदा एवं कांटाफोड़ में ही मंडियां हैं, जहां बड़े पैमाने पर क्षेत्र में उत्पादित कपास का नीलामी के माध्यम से किसान कपास का विक्रय करते हैं। मंडियां बंद होने से आज स्थिति यह है की कपास का पहले तो कोई खरीदार नहीं है और है भी तो ये व्यापारी किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर कम दामों में कपास खरीदकर जबरर्दस्त मुनाफा कमाने में लगे हैं। मंडियां बंद होने से व्यापारी किसानों से कपास 2000 से लेकर 2500 रुपए तक के मूल्य पर ही क्रय कर रहे है। जिससे न तो किसानों की लागत और न ही परिवहन मूल्य निकल पा रहा है। ऊपर से कर्जदारों के अत्यधिक दबाव की वजह से किसानों के चेहरों पर बेबसी साफ झलक रही है। लाक डाउन के चलते कपास मंडिया चालू नहीं हुई है और किसानों की इसी मजबूरी का फायदा कपास व्यापारी उठा रहे हैं।

Chandraprakash Sharma Desk
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