scriptDonation of body and house for public welfare | जनकल्याण के लिए देह और मकान का किया दान | Patrika News

जनकल्याण के लिए देह और मकान का किया दान

रेवाबाग निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक रानाडे ने लिया निर्णय

देवास

Published: June 14, 2022 05:31:36 pm

देवास। शहर के रेवाबाग क्षेत्र निवासी 73 वर्षीय सुधीर दिनकरराव रानाडे ने अपनी देह व मकान का दान कर समाज के सामने एक उदाहरण पेश किया। रानाडे सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, साथ ही निजी क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
सोमवार रेवाबाग में उनके निवास के समीप हुए कार्यक्रम में रानाडे ने अपने 2772 स्क्वेयर फीट का मकान एक संस्था को दान दे दिया। साथ ही उन्होंने अपनी देह दान करने की भी घोषणा की है। रेवाबाग में स्थित यह मकान उनके पिता ने बनवाया था। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने यह निर्णय लिया। उनके इस निर्णय में उनके परिवारजनों ने भी सहमति व्यक्त की। समाज सेवा को समर्पित संस्था राजाभाऊ महाकाल सेवा न्यास के राष्ट्र चेतना के प्रति समर्पण भाव के साथ की जा रही गतिविधियों को देखते हुए उन्होंने मकान को विभिन्न जनहितकारी सामाजिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए दान किया है। समारोह में विभिन्न सामाजिक संगठनों के गणमान्यजनों की उपस्थिति में रानाडे ने यह घोषणा की। अशोक जाधव, न्यास के अध्यक्ष मनोहर विश्वकर्मा, आरोग्य भारती के अध्यक्ष डॉ. सुनील लाड़, मोहन वर्मा सहित गणमान्य जन, युवा शक्ति उपस्थित रहे।
जनकल्याण के लिए देह और मकान का किया दान
जनकल्याण के लिए देह और मकान का किया दान
स्वयं को संतुष्ट महसूस कर रहे हैं
रानाडे ने कहा कि वो आधुनिक काल में भी महाऋषि दधीचि के देहदान को याद करते हैं एवं चिकित्सा क्षेत्र में इस तरह के दान को अच्छे शोध कार्यों के लिए समर्पित करना चाहते हैं। अपने जीवन काल में ही वे अपने मकान को कानूनी रूप से सेवा क्षेत्र में दान देकर स्वयं को संतुष्ट महसूस कर रहे हैं। उपस्थितजनों ने उनके इस कार्य को मां भारती की सेवा माना एवं उनसे प्रेरणा लेकर समाज हित में काम करते रहने का संकल्प व्यक्त किया।
पिताजी ने वसीयत नहीं लिखी तो मैं क्यों लिखूं
रानाडे ने बताया यह मकान मेरे पिताजी ने 1961 में खरीदा था। तब मेरे मामा ने कहा था कि इसकी वसीयत करो। तब पिताजी ने कहा था कि यह मेरा नहीं, ईंट और पत्थर का है। जिसके भाग्य में ये मकान होगा वो ले जाएगा। हम तीन भाई व बहन है। सभी की इच्छा थी कि यह संस्था को मिले। समाज के काम आए। मेरे पिताजी ने जब वसीयत नहीं लिखी तो मैं क्यों करूं। रानाडे ने बताया वे संघ से शुरू से प्रभावित रहे। दूसरे में थे तब संघ की शाखा में जाते थे।

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