बड़े नेताओं की जिद में उलझ गया भाजपा का टिकट

--न्यायाधीश को रोकने के लिए बढ़ाया मालवीय का नाम, इंदौर-उज्जैन के नेता भी कतार में

By: Amit S mandloi

Published: 29 Mar 2019, 12:24 PM IST

देवास. भाजपा में टिकट का मामला सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है। बड़े नेताओं की जिद के चलते दावेदार उलझ गए हैं और किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है। रोज नए समीकरण बन रहे हैं और नए नाम सामने आ रहे हैं। उलझन इतनी बढ़ गई है कि टिकट की घोषणा रूक गई है। दावेदार भी घर लौट आए हैं और अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।

दरअसल उज्जैन का टिकट तय होने के बाद देवास-शाजापुर संसदीय सीट के टिकट को लेकर हलचल तेज हुई थी। इस सीट से दो दर्जन से ज्यादा दावेदार हैं, लेकिन अंतिम दौड़ में आधा दर्जन ही बचे। उज्जैन से अनिल फिरोजिया का टिकट तय होने के बाद कहा गया कि देवास-शाजापुर सीट से बलाई समाज को टिकट दिया जाएगा। बलाई समाज से संघ की ओर से सबसे सशक्त नाम न्यायाधीश और मनीष सोलंकी का था। इसके बाद इसी सीट से सांसद रहे नेता ने सतीश मालवीय और चंद्रशेखर मालवीय का नाम आगेे बढ़ाया। चिंतामणि मालवीय भी दमदारी से जुटे रहे। टिकट मालवीय बनाम सोलंकी हो गई और दौड़ में शामिल सूरज कैरो, प्रेमचंद गुड्डू, राजेंद्र वर्मा, सुरेंद्र वर्मा आदि नाम पिछड़ गए। उलझन इतनी बढ़ी कि हाईकमान फैसला नहीं कर पाया और बात अब टलती नजर आ रही है।

मालवीय बनाम सोलंकी हुआ मामला

सूत्रों के मुताबिक न्यायाधीश का नाम दमदारी से सामने आने पर कई नेताओं की नींद उड़ गई। इस नाम को पीछे हटाने के लिए तर्क दिया कि उनके उपनाम से बलाई समाज स्पष्ट नहीं होता, जबकि न्यायाधीश बलाई समाज के हैं। यह भी तर्क दिया कि न्यायाधीश का पार्टी में योगदान नहीं है। कार्यकर्ताओं का हक मारा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक न्यायाधीश ने अपने बलाई समाज व संघ से जुड़कर काम करने के प्रमाण हाईकमान तक पहुंचाए हैं। इधर प्रदेश संगठन व संघ ने बलाई समाज के सशक्त और शिक्षित दावेदार के रूप में ही न्यायाधीश और मनीष सोलंकी का नाम भेजा था, लेकिन बड़े नेता की जिद में मामला अटक गया है। लंबे समय से सोनकच्छ से टिकट मांग रहे चंद्रशेखर मालवीय का नाम आगे बढ़ा है, जिस कारण सोलंकी के नाम पिछड़ गए हैं। चिंतामणि मालवीय के नाम पर भी विचार करने की बात उनके समर्थक बता रहे हैं और कह रहे हैं कि यदि मामला उलझ गया तो इस नाम पर सहमति बन जाएगी। हालांकि सभी दावेदार अभी भी दमदारी से जुटे हुए हैं और अलग-अलग माध्यमों से अपनी उम्मीद जिंदा रखे हुए हैं।

Amit S mandloi
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