पीले सोने के बजाय दूसरी फसलों पर कर रहे विचार क्योंकि लागत बढ़ती जा रही और उत्पादन घट रहा...

पीले सोने के बजाय दूसरी फसलों पर कर रहे विचार क्योंकि लागत बढ़ती जा रही और उत्पादन घट रहा...
patrika

mayur vyas | Publish: Oct, 12 2019 11:23:20 AM (IST) Dewas, Dewas, Madhya Pradesh, India

- शुरुआत में सोयाबीन से सुधरी किसानों की आॢथक स्थिति लेकिन बीते कुछ वर्षों से हो रहा नुकसान

देवास. किसी समय पीले सोने की बदौलत आॢथक रूप से संपन्नता पाने वाले किसानों का अब सोयाबीन से मोह भंग हो रहा है। जब सोयाबीन की फसल नई-नई आई थी तब कम लागत में अच्छा उत्पादन हो जाता था लेकिन अब लागत तीन गुना हो चुकी है और इसकी तुलना में उत्पादन एक गुना रह गया है। जो उमीद रहती है वह प्राकृतिक आपदा में धुंधली हो जाती है और किसान हाथ मलते रह जाते हंै। इस कारण से अब किसान खरीफ की वैकल्पिक फसल पर विचार कर रहे हैं।
दरअसल 80-90 के दशक में जब सोयाबीन की फसल आई थी तब किसानों ने इसमें रूचि जताई। इसका लाभ भी मिला और नतीजा यह हुआ कि बाद के सालों में किसानों ने खरीफ फसल के रूप में सोयाबीन को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यह निर्णय सही भी रहा और किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरी मगर बीते कुछ सालों से यही सोयाबीन की फसल अब मुनाफे के बजाय घाटे का सौदा बन रही है। इसके चलते किसानों का सोयाबीन से मोह भंग होने लगा है और ऐसी फसल को विकल्प के रूप में तलाश रहे हैं जो कम से कम अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि की स्थिति में अच्छे उत्पादन की उमीद बरकरार रखे।
पहले हुआ फायदा, अब हो रहा नुकसान
शिप्रा सुकल्या के किसान त्रिलोकचंद्र पटेल ने सोयाबीन की फसल से जुड़ी आप बीती सुनाई। पटेल ने कहा कि मेरे पास करीब 12 बीघा जमीन है। वर्ष १९८५ के आसपास पहली बार सोयाबीन की फसल की बोवनी की थी। इसके पहले मक्का, काली तुअर, ज्वार, उड़द, मंूग, मूंगफली आदि फसलें बोते थे। पीले सोने के आने के बाद इसकी बुआई की और इसका अच्छा परिणाम मिला। शुरुआत में भाव कम थे लेकिन बाद में भाव सुधरे। प्रति बीघा करीब चार से पांच क्विंटल उत्पादन होता था। लागत भी कम थी। उस समय बैलों से जुताई हो जाती थी। डोरे चलते थे। ङ्क्षनदाई-गुढ़ाई हो जाती थी। इसमें ज्यादा खर्चनहीं आता था, जिस कारण सोयाबीन से मुनाफा हुआ लेकिन बीते कुछ सालों से स्थिति बदली है। अब लागत तीन गुना हो गई है और उत्पादन एक गुना रह गया है। ट्रैक्टर से हंकाई-जुताई का खर्च बढ़ गया है। खरपतवार नाशक, कीटनाशक दवाइयों के छिडक़ाव का खर्च बढ़ा है। खाद के दाम बढ़े हैं। इस कारण दिक्कत आ रही है। जिस सोयाबीन से आॢथक स्थिति मजबूत हुई थी अब उसी सोयाबीन से आॢथक स्थिति कमजोर हो रही है। प्राकृतिक आपदा भी बड़ा कारण है। अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, अनावृष्टि तीनों ही स्थिति का प्रभाव सोयाबीन पर पड़ रहा है और उत्पादन घट रहा है। इस साल तो सोयाबीन की फसल लगभग पूरी तरह बर्बाद हो गई। उत्पादन भी एक से डेढ़ क्विंटल प्रति बीघा तक आ पहुंचा।
मक्का की ओर बढ़ रहा रूझान
किसान पटेल के अनुसार सोयाबीन से हो रहे घाटे के कारण अब मक्का की ओर रूझान बढ़ रहा है। पिछले साल से मक्का की खेती की ओर अग्रसर हो रहा हूं। कई किसान इस तरह के विकल्प तलाश रहे हैं। यह प्रयास चल रहा है कि खेत के थोड़े-थोड़े हिस्से में अलग-अलग फसल लगाई जाए। ऐसी फसल जो प्राकृतिक आपदा आने पर भी प्रभावित न हो। कम से कम अनियमितता, अनिश्चितता न रहे। लगातार सोयाबीन की बुआई से जमीन के पोषक तत्व भी कम हो रहे और उर्वरक क्षमता घट रही है। इस कारण खरीफ की फसल के रूप में विकल्प तलाश रहे हैं।

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