राजकीय सम्मान के साथ हुआ केके ढीढी का अंतिम संस्कार, वदाई देने उमड़ा सैलाब

राजकीय सम्मान के साथ हुआ केके ढीढी का अंतिम संस्कार, वदाई देने उमड़ा सैलाब

Deepak Sahu | Publish: Jan, 20 2019 02:33:13 PM (IST) Dhamtari, Dhamtari, Chhattisgarh, India

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांति कुमार ढीढी को शनिवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा।

धमतरी. धमतरी जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांति कुमार ढीढी को शनिवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा। सुबह करीब 11.30 बजे नगर पंचायत भखारा के मुख्य मार्ग के किनारे उनके पार्थिव शरीर की अत्येष्ठी की गई।

उल्लेखनीय है कि अंगे्रजी शासनकाल के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांति कुमार ढीढी (97) का बीमारी के चलते शुक्रवार की देर शाम निधन हो गया था। शनिवार को उनके पार्थिव शरीर को समाधि स्थल पर राष्ट्रध्वज तिरंगा से लपेट कर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था। उनकी एक झलक पाने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा। अंतिम दर्शन के बाद पुलिस के जवानों ने उन्हें सलामी देकर गॉर्ड ऑफ ऑनर का सम्मान दिया।

जनप्रतिनिधियों, गणमान्य नागरिक और ग्रामीणों ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया। इसके बाद नगर पंचायत भखारा के मुख्यमार्ग के किनारे उनके पार्थिव शरीर की अत्येंष्ठी की गई। मौके पर विधायक रंजना साहू, कुरूद जनपद पंचायत अध्यक्ष पूर्णिमा साहू, उपाध्यक्ष छत्रपाल बेस, पूर्व विधायक लेखराम साहू, जिला पंचायत सदस्य नीलम चंद्राकर, नगर पंचायत भखारा अध्यक्ष विनोद साहू, पूर्व अध्यक्ष भरत नाहर, एसपी बालाजी राव, अपर कलक्टर लीना कोसम, एसडीएम कुरूद प्रेम पटेल, जिला कांग्रेस अध्यक्ष मोहन लालवानी, जितेन्द्र गढ़वी, विजय देवांगन, आशीष रात्रे समेत गणमान्य नागरिक मौजूद थे।

राष्ट्र सेवा का लिया संकल्प
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पुत्र घनश्याम ढीढी, हीरालाल ने कहा वे ऐसे महान हस्ती के पुत्र है, जिन्होंने भारत देश को आजाद कराने के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। ऐसे पिता का पुत्र होने पर उन्हें गर्व है। उन्होंने पिता से मिले संस्कार और उनके दिखाए रास्ते पर चलकर राष्ट्र और समाज की सेवा करने का संकल्प दोहराया।

परिचय एक नजर में
उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी क्रांति कुमार ढीढी ने तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए वर्ष-1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। जिसके चलते उन्हें रायपुर जेल में छह माह की सजा भी हुई थी। उन्होंने अपने जीवन के ३२ बरस तक शिक्षक के रूप में सेवा दी है। उनके द्वारा किए गए संघर्ष के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित भी किया गया था।

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