गुप्त नवरात्र की समाप्ति पर इस आयु की कन्या के पूजन से होते हैं असाध्य कार्य भी सिद्ध - 21 जुलाई 2018

गुप्त नवरात्र की समाप्ति पर, इस उम्र की कन्या को भोजन कराने से हर कार्य सिद्ध होते हैं

By: Shyam

Published: 20 Jul 2018, 01:37 PM IST

नौ दिनों तक चलने वाली गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा के साथ ही अष्टमी या नवमी तिथि को देवी स्वरूप छोटी छोटी कन्याओं का पूजन करने के बाद उनको स्वादिष्ट भोजन भी कराने का विधान शास्त्रों में बताया गया हैं । गुप्त नवरात्रि में समाप्ति के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व माना गया क्योंकि इन्हें मां दुर्गा का साक्षात रूप माना जाता हैं । आमतौर पर दो वर्ष से नौ वर्ष तक की कन्याओं को ही भोजन कराने का विधान हैं ।


वैसे तो हर उम्र की कन्या का विशेष कार्यों की सिद्धि के लिए पूजन किया जाता है, गुप्त नवरात्रि के अंतिम दिन यानी की नवमी तिथि को शास्त्रों के द्वारा निर्धारित उम्र की छोटी कन्याओं को भोजन करने, पूजन करने एवं उनको दान आदि देने से मां दुर्गा की कृपा से साधक की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करती हैं ।

1- गुप्त नवरात्रि की समाप्ति पर दो वर्ष की कन्या जिसे मां दुर्गा का कौमारी कहा जाता हैं, दो वर्ष की कन्या का पूजन कर भोजन कराने से व्यक्ति के दुख और दरिद्रता दूर होती है ।

2- तीन वर्ष की कन्या को मां दुर्गा का त्रिमूर्ति रूप माना जाता हैं । गुप्त नवरात्रि में इनको भोजन कराने व पूजन करने से व्यक्ति का जीवन धन-धान्य से भर जाता हैं, और परिवार का कल्याण होता है ।

3- चार वर्ष की कन्या को मां दुर्गा के कल्याणी रूप में पूजा जाता हैं, गुप्त नवरात्रि में इनकी पूजा और इन्हें भोजन कराने से सुख-समृद्धि का वरदान मां दुर्गा प्रदान करती हैं ।

4- पांच वर्ष की कन्या को मां दुर्गा का रोहिणी रूप कहा जाता है, और गुप्त नवरात्रि में इनकी पूजा से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है ।

5- छह वर्ष की कन्या मां दुर्गा का चण्डिका रूप मानी जाती हैं, गुप्त नवरात्रि में इनका पूजन करने, दान देने और भोजन कराने से व्यक्ति को ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं ।

6- आठ वर्ष की कन्या को माता दुर्गा का शाम्भवी कहा जाता हैं, गुप्त नवरात्रि में आठ वर्ष की कन्या को भोजन कराने और पूजन करने से व्यक्ति को समाज में लोकप्रियता मिलती हैं ।

7- नौ वर्ष की कन्या को साक्षात मां दुर्गा माना जाता है और नौ वर्ष की कन्या का पूजन करने, दान देने और भोजन कराने से व्यक्ति के सभी शत्रु मित्र बन जाते है और असाध्य लगने वाले कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं ।

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