आज व्रत या दान करें, मिलेगा सौ अश्वमेघ यज्ञों का फल, पूरी होंगी सभी मनोकामनाएं

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 'जया एकादशी' के नाम से जानी जाती है

By: सुनील शर्मा

Published: 05 Feb 2017, 11:46 AM IST

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 'जया एकादशी' के नाम से जानी जाती है। जो इस वर्ष 7 फरवरी को है। सनातन धर्म में एकादशी तिथि के व्रत पूजन का सर्वाधिक महत्त्व बताया गया है। श्रीमद्भगवतगीता में भी परमेश्वर श्री कृष्ण ने इस तिथि को स्वयं के समान ही बलशाली बताया है।

यह भी पढें: ये छोटा सा टोटका दूर कर देता है हर टेंशन, खर्चा एक रूपया नहीं होता

यह भी पढें: आपके घर में है नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव तो आपकी रसोई का पानी हो सकता है बहुत उपयोगी

श्रेष्ठ है एकादशी व्रत

पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी तिथि का महत्त्व बताते हुए कहा है कि जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, देवताओं में श्री विष्णु तथा मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। सभी एकादशियों में नारायण के समान ही फल देने की शक्ति होती है। इस व्रत को करने के बाद और कोई पूजा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इनमें जया एकादशी सब पापों का नाश करने वाली उत्तम तिथि है। इतना ही नहीं, यह ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पाप तथा पिशाचत्व का भी विनाश करने वाली है। इसका व्रत करने से मनुष्य को कभी प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता।

यह भी पढें: पुत्र समान लक्ष्मण को निगल गईं जब सीता, दूर से देख रहे थे हनुमान, जानिए क्यों?

यह भी पढें: अपने जन्मदिन के वार से जानिए अपनी और दूसरों की ये गुप्त बातें

यह भी पढें: सत्यभामा को सारथी बनाकर 16,100 कन्याओं के पति बने थे श्रीकृष्ण, जानिए क्या था रहस्य

विष्णु भगवान की करें पूजा

एकादशी स्वयं विष्णुप्रिया है इसलिए इस दिन जप, तप, पूजा पाठ करने से प्राणी जगत नियंता विष्णु का सान्निध्य प्राप्त कर लेता है। साधक को इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की मूर्ति को "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का उच्चारण करते हुए स्नान आदि कराकर वस्त्र, चंदन, जनेऊ, गंध, अक्षत, पुष्प, तिल, धूप-दीप, नैवैद्य, ऋतुफल, पान, नारियल आदि अर्पित करके कर्पूर से आरती उतारनी चाहिए। सात्विक भोजन करें एवं तामसी पदार्थों के सेवन से दूर रहें।

यह भी पढें: आपके घर में है नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव तो आपकी रसोई का पानी हो सकता है बहुत उपयोगी

यह भी पढें: हनुमानजी के इस कवच में है अपार शक्ति, बोलने मात्र से ही दूर होती हैं सब बाधाएं

यह भी पढें: घर में लगाएं सुंदर लड़कियों की तस्वीर, आने लगेगा पैसा ही पैसा

क्या कहती है कथा

माल्यवान नाम का गन्धर्व व पुष्पवन्ती नाम की अप्सरा का इंद्र की सभा में गान हो रहा था। परस्पर अनुराग के कारण दोनों मोह के वशीभूत हो गए व इनके चित्त में भ्रान्ति आ गई। इसलिए ये शुद्ध गान न गा सके। इंद्र ने इसमें अपना अपमान समझा और कुपित होकर दोनों को पति-पत्नी के रूप में रहते हुए पिशाच हो जाने का श्राप दे दिया। पिशाच योनि को पाकर दोनों हिमालय पर्वत पर भयंकर दु:ख भोगने लगे। देवयोग से जया एकादशी के दिन दोनों ने सब प्रकार का आहार त्याग, जलपान तक नहीं किया और पीपल के वृक्ष के निकट बैठकर उन्होंने रात गुजार दी। द्वादशी का दिन आया, उन पिशाचों के द्वारा जया के उत्तम व्रत का पालन हो गया। उस व्रत के प्रभाव से व भगवान विष्णु की शक्ति से उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। पुष्पवन्ती और माल्यवान पुन: अपना दिव्य रूप प्राप्त कर स्वर्ग चले गए।
सुनील शर्मा
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned