लव मैरिज करने से पहलें जरूर देख लें ये बात, वरना ग्रह करवा देंगे तलाक!

Sunil Sharma

Publish: Aug, 28 2017 03:52:00 (IST)

Dharma Karma
लव मैरिज करने से पहलें जरूर देख लें ये बात, वरना ग्रह करवा देंगे तलाक!

प्रेम विवाह से पहले जातक को भावी वर या वधू की जन्म कुंडली मिलाकर ग्रहों की अनुकूलता अवश्य देख लेनी चाहिए

प्रेम विवाह से पहले जातक को भावी वर या वधू की जन्म कुंडली मिलाकर ग्रहों की अनुकूलता अवश्य देख लेनी चाहिए। विद्वानों का कहना है कि ग्रहों की अनदेखी भारी पड़ सकती है।

  1. दोनों के शुभ ग्रह समान भाव में हो यानी एक की कुंडली में शुभ ग्रह यदि लग्न, पंचम, नवम या केंद्र में हो और दूसरे के भी इन्हीं भावों में हो।
  2. दोनों के लग्नेश और राशि स्वामी एक ही ग्रह हों। जैसे एक की राशि मीन हो और दूसरे की जन्म लग्न मीन होने पर दोनों का राशि स्वामी गुरु होगा।
  3. एक का सप्तमेश जिस राशि में हो वही दूसरे की राशि हो या दोनों का राशि स्वामी एक ही ग्रह हो जैसे- मेष-वृश्चिक (मंगल), वृष-तुला (शुक्र), मिथुन- कन्या (बुध) इन उत्तम तालमेल से दाम्पत्य जीवन में आने वाली कई परेशानियां अपने आप दूर हो जाती हैं।
  4. दोनों के लग्नेश, राशि स्वामी या सप्तमेश समान भाव में या एक दूसरे के सम-सप्तक होने पर रिश्तों में प्रगाढ़ता और प्रेम भावना बढ़ती है।
  5. एक के सप्तम भाव में जो राशि हो वही दूसरे की नवमांश कुंडली का लग्न हो या वर/वधू के सप्तमेश की नवमांश राशि दूसरे की चंद्र राशि हो।
  6. सप्तम और नवम भाव में राशि परिवर्तन हो तो शादी के बाद भाग्योदय होता है। सप्तमेश ग्यारहवें या द्वितीय भाव में स्थित हो और नवमांश कुंडली में भी सप्तमेश 2, 5 या 11वें भाव में है तो ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी से आर्थिक लाभ होता है।

विवाह टालें, जब हो ऐसे योग
शनि, सूर्य, राहु, 12वें भाव का स्वामी (द्वादशेश) और राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी (जैसे राहु मीन राशि में हो तो, मीन का स्वामी गुरु राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होगा) पांच ग्रह विच्छेदात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। इनमें से किन्हीं दो या अधिक ग्रहों की युति या दृष्टि संबंध जन्म कुंडली के जिस भाव या भाव स्वामी से होता है तो उसे नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए सप्तम भाव या उसके स्वामी को इन ग्रहों द्वारा प्रभावित करने पर दाम्पत्य जीवन में कटुता आती है।

सप्तम भाव में शनि दाम्पत्य जीवन को नीरस बनाता है, मंगल आयु में कमी करता है, सूर्य आपस में मतभेद पैदा करता है। सप्तम भाव में बुध-शनि दोनों नपुंसक ग्रहों की युति व्यक्ति को भीरू (डरपोक) और निरुत्साही बनाते हैं। यदि इन ग्रह परिस्थितियों के कोई अन्य परिहार (काट) या उपाय जन्म कुंडली में उपलब्ध नहीं हो तो विवाह नहीं करना चाहिए।

बुध और शुक्र सप्तम भाव के कारक हैं। ऐसे में बुध अश्लेषा, ज्येष्ठा या रेवती नक्षत्र में रहते हुए अकेले सप्तम भाव में हो या शुक्र-भरणी, पूर्वा फाल्गुनी या पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में रहते हुए अकेला सप्तम भाव में हो और इन पर किसी अन्य ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो त्रिखल दोष के कारण सुखी दाम्पत्य जीवन में बाधक बनेंगे। ऐसे में अगर विवाह किया जाता है तो दोनों के दाम्पत्य जीवन पर क्लेश हावी रहेगा। डॉ. महेश शर्मा

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