अपने ईष्ट का मंत्र जप करते वक्त ऐसा करेंगे तो मिलेगा अधिक लाभ

Shyam Kishor

Publish: Jul, 13 2018 03:23:24 PM (IST)

धर्म कर्म
अपने ईष्ट का मंत्र जप करते वक्त ऐसा करेंगे तो मिलेगा अधिक लाभ

ईष्ट का मंत्र जप करते समय रखे इन बातों का ध्यान

भारतीय संस्कृति में हिन्दू धर्म को मानने वाला हर श्रद्धालु किसी न किसी रूप में अपने ईष्ट की आराधना करता हैं और ईष्ट मंत्र का जप कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने का प्रयास करता हैं । लेकिन शास्त्रों में देवी देवताओं के मंत्र जप के कुछ नियम भी बताएं गये है कि मंत्र का जप करते समय किस प्रकार से मंत्र का उच्चारण किया जाये, मन्त्रों का उच्चारण किस स्वर में किया जाये जिससे मंत्र जप का लाभ अधिक मिल सके यह बहुत महतवपूर्ण है । मंत्र जप के समय होठों के हिलने, स्वांस तथा स्वर के निस्सरण के आधार पर शास्त्रों ने मंत्र जप को तीन वर्गों में विभाजित किया है ।

 

1- वाचिक जप


जिस प्रकार से ईश्वर का भजन -कीर्तन और आरतियां ऊंचे स्वर में की जाती है, उस तरह उच्च स्वरों में तो मंत्रों का जप निषेध माना गया है । शास्त्र कहते है कि मंत्र जप करते समय स्वर भाहर नहीं निकला चाहिए । जब जप करते समय मंत्रों का उच्चारण इतने तीव्र स्वरों में होता है की ध्वनि जप करने वाले साधक के कानों में पड़ती रहे, उसे वाचिक जप कहते हैं ।

 

2- उपांशु जप


मंत्र जप की इस विधि में मंत्र की ध्वनि मुख से बाहर नहीं निकलती, परन्तु जप करते समय साधक की जीभ और होंठ हिलते रहना चाहिए, उपांशु जप में किसी दुसरे व्यक्ति के देखने पर साधक होंठ हिलते हुए तो प्रतीत होते है, पर कोई भी शब्द उसे सुनाई नहीं देता ।

 

3- मानस जप


शास्त्र के अनुसार मन्त्र जप की इस विधि में जपकर्ता के होंठ और जीभ नहीं हिलते, केवल साधक मन ही मन मंत्र का मनन करता हैं, इस अवस्था में जपकर्ता को देखकर यह नहीं बताया जा सकता कि वह किसी मंत्र का जप भी कर रहा है ।

 

शास्त्रों में इन सभी जपों में मानस जप को ही सर्वश्रेष्ठ जप बताया गया है और उपांशु जप को मध्यम जप और वाचिक जप मानस जप की प्रथम सीढ़ी बताया गया हैं । मंत्र जप और मानसिक उपासना, आडम्बर और प्रदर्शन से रहित एकांत में की जाने वाली वे मानसिक प्रक्रियाएं है जिनमें मुख्यतः भावना और आराध्यदेव के प्रति समर्पण भाव का होना बहुत जरुरी होता हैं ।

mantra jap
Ad Block is Banned