खतरनाक धुएं के आगोश में 40 हजार की आबादी, क्षेत्र में धधक रहे भट्टे

राजाखेड़ा. राजाखेड़ा शहरी क्षेत्र में नियमविरुद्ध आबादी इलाकों में संचालित 33 फीसदी अवैध ईंट भट्टे 40 हजार से अधिक की शहरी आबादी के स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इनपर कोई भी कार्यवाही नहीं होना उपखंड प्रशासन के साथ जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़े कर रहा है। वहीं भट्टा माफिया की राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में ऊंची पहुंच को भी स्पष्ट कर रहा है।

By: Naresh

Published: 23 Jan 2021, 08:32 PM IST

खतरनाक धुएं के आगोश में 40 हजार की आबादी, क्षेत्र में धधक रहे भट्टे
शहरी क्षेत्र में 33 फीसदी भट्टे अवैध फिर भी प्रशासन मौन
राजाखेड़ा. राजाखेड़ा शहरी क्षेत्र में नियमविरुद्ध आबादी इलाकों में संचालित 33 फीसदी अवैध ईंट भट्टे 40 हजार से अधिक की शहरी आबादी के स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इनपर कोई भी कार्यवाही नहीं होना उपखंड प्रशासन के साथ जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़े कर रहा है। वहीं भट्टा माफिया की राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में ऊंची पहुंच को भी स्पष्ट कर रहा है।
33 फीसदी अवैध
खतरनाक तथ्य यह है कि शहरी क्षेत्र में आबादी के भीतर धधक रहे भट्टों में से 33 फीसदी तो पूरी तरह अवैध हैं। जिनका भूमि रूपांतरण तक नहीं हुआ है। ऐसे में न तो प्रदूषण नियम न ही अन्य किसी नियम की पालना कर रहे है। शहरी क्षेत्र में मुख्यालय पर स्थापित होते हुए भी प्रशासन की नाक के नीचे अवैध भट्टों का संचालन किसी गहरे गठजोड़ की ओर इशारा कर रहा है।
बच गया ताज, पर इंसानों का क्या
विगत दो दशक पूर्व ताजमहल को बचाने के लिए उच्चतम न्यायालय की ताज त्रिपोजियम योजना में आगरा से खदेड़े गए भट्टा व्यवसायियों ने यहां के प्रशासन को मृतप्राय भांपकर इधर का रुख कर लिया। ग्रामीण तो दूर शहरी आबादी में प्रशासन की नाक के नीचे खुलेआम भट्टा स्थापित कर हवाओ में जहर घोलना आरम्भ कर दिया। लेकिन प्रशासन ने इन्हें रोकना तो दूर पेराफेरी नियमों का उल्लंघन कर आबादी में जहर घोलने की स्वीकृति दे दी। दबंगई का सिलसिला यहां भी नही रुका ओर एक दर्जन भट्टे तो अब तक बिना किसी स्वीकृति के ही संचालित होकर धुंआ का काला कारोबार कर रहे है। इस गलीज मुनाफे के धंधे से ताज तो बच गया, लेकिन यंहा 40 हजार से अधिक की शहरी आबादी के फेफड़ों को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है। हर शख्स इसे पूछ रहा है, लेकिन उसे कहीं से उत्तर नहीं मिल पा रहा है।
शिकायतों को दबाने का हुनर

शहरी क्षेत्र में संचालित ईंट भट्टों की जानकारी के लिए कई व्यक्तियों संस्थाओं ने नगरपालिका से जानकारी चाही, पर नहीं दी गई। जिस पर सूचना का अधिकार के तहत भी आवेदन किए गए, लेकिन उनको भी अनुत्तरित कर दिया गया। अंतत: पत्रिका की खबरों के बाद दबाव में आए प्रशासन की प्राथमिक जांच में प्राथमिक आंकड़ों ने नगरपालिका की कलई खोल ही दी। हालांकि इस सारे कारोबार में जिम्मेदार सिर्फ नगरपालिका ही नहीं, बल्कि प्रशासन भी है। फिर भी सारे प्रकरण को दबाने की हरसंभव कोशिश की जा रही है।
जिम्मेदार नहीं दे पा रहे जवाब

इस मुद्दे पर नगरपालिका का रुख जानने के लिए अधिशासीी अधिकारी राहुल मित्तल को कई बार मोबाइल पर कॉल किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। मामले की गंभीरता को समझने और उनका पक्ष जानने के लिए व्हाट्सएप पर भी संदेश दिया गया, पर उसके बाद भी उन्होंने जबाव देना उचित नहीं समझा

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