बिहार से राजाखेड़ा पहुंच रहा कोरोना का बड़ा खतरा, हर वर्ष पहुंचते है 20 हजार से अधिक भट्टा मजदूर

राजाखेड़ा. अब तक सामूहिक प्रयास से नियंत्रण में आता दिख रहा कोरोना राजाखेड़ा उपखंड में प्रशासनिक लापरवाही के चलते बेकाबू होने के कगार पर है। जहां बिना किसी मॉनिटरिंग के इस माह में लगभग बीस हजार प्रवासी बिहारी भट्टा मजदूरों का आगमन आरम्भ हो चुका है, लेकिन अब तक न तो इनके पंजीकरण का ही कोई मैकेनिज्म तैयार करने के प्रयास किए गए हैं और न ही प्रवेश पूर्व इनकी कोरोना जांच ही आरम्भ हो पाई है।

By: Naresh

Published: 20 Sep 2020, 03:41 PM IST


बिहार से राजाखेड़ा पहुंच रहा कोरोना का बड़ा खतरा, हर वर्ष पहुंचते है 20 हजार से अधिक भट्टा मजदूर
-बिना कोरोना जांच और पंजीकरण के आगमन
प्रशासन के पास नहीं है आंकड़े
राजाखेड़ा. अब तक सामूहिक प्रयास से नियंत्रण में आता दिख रहा कोरोना राजाखेड़ा उपखंड में प्रशासनिक लापरवाही के चलते बेकाबू होने के कगार पर है। जहां बिना किसी मॉनिटरिंग के इस माह में लगभग बीस हजार प्रवासी बिहारी भट्टा मजदूरों का आगमन आरम्भ हो चुका है, लेकिन अब तक न तो इनके पंजीकरण का ही कोई मैकेनिज्म तैयार करने के प्रयास किए गए हैं और न ही प्रवेश पूर्व इनकी कोरोना जांच ही आरम्भ हो पाई है। ऐसे में बिहार में बेकाबू हो चुका कोरोना उपखंड के ईंट भट्टों के रास्ते यहां के आम लोगों में कोहराम मचा सकता है। प्रशासनिक लापरवाही का दंड यहां के लोगों को उठाना पड़ सकता है।

क्या है मामला
उपखंड में 100 के करीब वैध अवैध इन्ट भट्टे हैं, जो श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन करते हुए संचालित हो रहे हैं। मानसून के बाद इन भट्टों पर ईंट थपाई का काम आरम्भ हो जाता है। जिसके लिए स्थानीय भट्टा मालिक बिहार से मजदूर परिवारों को दलालों के माध्यम से अपने साधनों से यहां लेकर आते हैं। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही से इनका कोई भी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता है। चूंकि ये असंगठित रूप से कार्य करते है और सितंबर में आकर अगले वर्ष जून में मानसून के आगाज के साथ ही इनको वापस भेज दिया जाता है। ऐसे में ये यहां के स्थाई निवासी भी नहीं होते, न ही इनका कोई स्थायी आवास होता है।

नगरपालिका की आधी आबादी के बराबर संख्या
सभी ईंट भट्टे राजाखेड़ा नगरपालिका क्षेत्र और इसके सीमावर्ती ग्राम पंचायतों में है। प्रत्येक भट्टा पर मजदूर परिवारों के लगभग 200 सदस्य मजदूरी करते हैंं। ऐसे में इनकी कुल संख्या का आकलन बीस हजार से अधिक किया जाता है। जो नगरपालिका क्षेत्र की कुल आबादी 40000 की ठीक आधी है। ये सभी मजदूर अपनी सभी जरूरतों के लिए नियमित राजाखेड़ा बाजार आते है। ऐसे में अगर भट्टों से होकर कोरोना राजाखेड़ा आया तो हालात कितने भयावह होंगे, इसका अंदाजा तक लगाना कठिन है।

प्रवासी ही लाए थे कोरोना
गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण जब सभी ओर फैल चुका था, तब भी जिला सुरक्षित था। लेकिन प्रवासी मजदूरों के साथ ही प्रविष्ठ हुआ कोरोना अब जिले में अनियंत्रित हो चुका है। अगर ऐसे में पूर्व के प्रवासियों की कुल संख्या से कई गुना प्रवासी मजदूर अगर प्रवेश करेंगे तो हालात को खुद ही समझा जा सकता है। जबकि ये सभी कोरोना से बुरी तरह जूझ रहे बिहार प्रदेश से आने वाले है। तब भी ऐसी लापरवाही का बड़ा अंजाम भुगतना पड़ सकता है।

इनका कहना है

क्या उपखंड प्रशाशन पर कोई ऐसी व्यवस्था है, जहां सभी श्रमिकों के पंजीकरण की व्यवस्था हो। अगर नहीं है तो संवेदनशील क्षेत्रों के मजदूरों को बड़ी संख्या में लाकर यहां के लिए बड़ा खतरा पैदा करना तो नासमझी है।
प्रिंस जैन, सामाजिक कार्यकर्ता

इनका कहना है

बाजार में बड़ी संख्या में बाहरी लोगों का आना, जिनकी संख्या हजारों में हो तो सीधी सी बात है कि खतरा भी बड़ा है। यह सिर पर मंडरा रहा है। प्रशासन कार्यालयों में दुबक कर खुद डरा बैठा है। रामभरोसे है राजाखेड़ा। भगवान ही बचा सकता है हमें।

राजीव अलापुरिया, व्यापारी नेता, राजाखेड़ा।

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