धौलपुर से एक कविता रोज....चम्बल धारा

जमी की हर तरफ देखो,
ये मेरा शहर प्यार है।
मेरे मन की उमंगों में,
बहे चम्बल की धारा है।
किनारे बैठकर राहत की,

By: Naresh

Updated: 16 Oct 2020, 06:19 PM IST

धौलपुर से एक कविता रोज....चम्बल धारा

जमी की हर तरफ देखो,
ये मेरा शहर प्यार है।
मेरे मन की उमंगों में,
बहे चम्बल की धारा है।
किनारे बैठकर राहत की,
मैं तो सांस लेता हूं,
तेरी कल-कल की आवाजों,
को दिल से नाप लेता हूं।
उसी की राह में समतल,
जमी में घाव डाला है।
बड़े खूंखार मगरों को,
बड़े ही दिल से पाला है।
भरी बरसात में देखों,
ये उसका रूप न्यारा है।
मेरे मन की उमंगों में,
बहे चम्बल की धारा है।
बहे कण-कण जो पानी में
उसी में साफ होता है।
प्रकृति रूप औदे है
मुझे एहसास होता है।
पिलाए नीर अपना,
हर किसी का ये सहारा है।
मेरे मन की उमंगों में
बहे चम्बल की धारा है।
किनारे बैठकर राहत की,
मैं तो सांस लेता हूं
तेरी कल कल की आवाजों को
दिल से नाप लेता हूं।


कवि- धर्मेन्द्र ङ्क्षसह सिखरौदिया, बीएससी बीएड, कुतुकपुर बाड़ी। कवि युवा हैं और विभिन्न विषयों पर लिखते रहते हैं। वहीं कई मंचों पर भी अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं।

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