सबके एक ही जज्बात, बच्चे स्कूल जाएं तो बने बात

धौलपुर. संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपातकाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट है कि बार-बार स्कूल बंद होने से दक्षिण एशिया में बच्चों के लिए सीखने के अवसरों में चिंताजनक असमानताएं पैदा हुई हैं।

By: Naresh

Updated: 11 Sep 2021, 06:13 AM IST

सबके एक ही जज्बात, बच्चे स्कूल जाएं तो बने बात

- स्कूल न जाने से बच्चों की पढ़ाई पर हो रहे दुष्प्रभाव पर बोले जिले के अभिभावक
- यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना काल में देश में 80 फीसदी बच्चों के सीखने के स्तर में आई कमी

धौलपुर. संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपातकाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट है कि बार-बार स्कूल बंद होने से दक्षिण एशिया में बच्चों के लिए सीखने के अवसरों में चिंताजनक असमानताएं पैदा हुई हैं। भारत में 14-18 साल के आयु वर्ग के कम से कम 80 फीसदी छात्रों ने कोविड-19 महामारी के दौरान सीखने के स्तर में कमी आने की सूचना दी, क्योंकि स्कूल बंद हैं। स्कूल बंद होने से बच्चों और उनके शिक्षकों को शिक्षा के लिए दूरस्थ माध्यमों का सहारा लेना पड़ा। कम इंटरनेट कनेक्टिविटी और उपकरण की उपलब्धता की कमी भी आड़े आई। लिहाजा बच्चों की शिक्षा एवं उनके सीखने के स्तर को नुकसान पहुंचा है। इस संबंध में पत्रिका ने जिले के अभिभावकों से विचार जाने। सभी ने एक स्वर में स्कूल की महत्ता बताई और बच्चों को स्कूल भेजे जाने पर जोर दिया।

बेटे को पहली बार स्कूल भेजने की सोच रहे थे। फिलहाल छोटे बच्चों के लिए स्कूल बंद हैं। घर पर स्कूल जैसी पढ़ाई का स्तर बनाए रखना नामुमकिन है। स्कूल तो खुलने ही चाहिए।
- नेहा रजत अग्रवाल, धौलपुर

सुरक्षा के कड़े मापदंडों के साथ विद्यालयों को आरम्भ से ही खोला जाना चाहिए था। घर में बंद रह कर बच्चों का नैसर्गिक विकास प्रभावित हुआ है। सरकार को इस दुष्प्रभाव को दूर करने के प्रयास करने चाहिए।
- राजेश शर्मा, धौलपुर

कोरोना ने देश के नौनिहालों के भविष्य पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। विद्यालय अब खुलने तो लगे हैं। करीब डेढ़ साल से स्कूल से दूर बच्चों पर भारी बोझ आ गया है।
- गणेश मुद्गल, राजाखेड़ा

मेरे बच्चों ने कोरोना काल के समय घर मे बंद रहकर बहुत कुछ खोया है। इसकी कभी पूर्ति नहीं की जा सकती। अब चिंतन इस बात पर होना चाहिए कि जो खो दिया उसकी प्रतिपूर्ति कैसे हो।
- प्रदीप उपाध्याय, राजाखेड़ा

कोविड-19 के दौरान विद्यालयों के बंद रहने से बच्चों की बुनियादी समझ पूरी तरह से कमजोर हो चुकी है। बच्चों के लिए स्कूल का कोई विकल्प नहीं है।

- डॉ. अम्बरीष पचौरी, बाड़ी

पिछले दो सत्रों से विद्यालय बंद रहने से अब बच्चे हाथों में किताब लेने से कतराते हैं। पढ़ाई के प्रति बच्चों का मोह भंग होता जा रहा है।
- मोहन सर्राफ, बाड़ी

एक्सपर्ट व्यू

विद्यालय में बच्चों का मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का विकास होता है। खासतौर से छोटे बच्चों का कक्षा शिक्षण जरूरी है। एक्स्ट्रा करिकुलम गतिविधियों से बच्चे जल्दी और अधिक समझते हैं। राजस्थान सरकार द्वारा स्माइल-3, आओ घर-घर सीखें आदि कार्यक्रमों से बच्चों को स्कूल व पढ़ाई से जोड़े रखने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है।

- केदार गिरि गोस्वामी, जिला शिक्षा अधिकारी, प्रारंभिक शिक्षा, धौलपुर

कोविड 19 के कारण शैक्षिक गतिरोध तो हुआ है। ऑनलाइन कक्षाएं स्कूलों का सटीक विकल्प नहीं हैं। हालांकि, राजस्थान में पूरा प्रयास किया गया कि बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखा जाए। इसका फायदा ये हुआ कि जितना नुकसान होना था, उससे कम हुआ है।

-अरविंद शर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी, माध्यमिक शिक्षा, धौलपुर।

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