देवछठ पर तुलसीवन में भरा मेला, कोरोना का नहीं दिखा खौफ

ड़ी. शहर के तुलसी वन मुक्तिधाम के पास स्थित तुलसी वन मंदिर पर सोमवार को देवछठ का मेला भरा। जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के महिला पुरुष और सभी आयु वर्ग के लोगों ने भाग लिया। अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी स्मृति में बनाए चबूतरों को साफ कर ब्राह्मणों को भोजन कराया। इस मोके पर मंदिर में बने राधा-कृष्ण मंदिर पर ढोक लगाई गई

By: Naresh

Published: 25 Aug 2020, 11:14 AM IST

देवछठ पर तुलसीवन में भरा मेला, कोरोना का नहीं दिखा खौफ
-ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने किया शादी के बाद नदी में मोहर-किलंगी का विसर्जन

बाड़ी. शहर के तुलसी वन मुक्तिधाम के पास स्थित तुलसी वन मंदिर पर सोमवार को देवछठ का मेला भरा। जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के महिला पुरुष और सभी आयु वर्ग के लोगों ने भाग लिया। अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी स्मृति में बनाए चबूतरों को साफ कर ब्राह्मणों को भोजन कराया। इस मोके पर मंदिर में बने राधा-कृष्ण मंदिर पर ढोक लगाई गई और ग्रामीण क्षेत्र से आयी महिलाओं ने मंदिर के पास बह रही बामनी नदी में शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन की मोहर-किलंगी का विसर्जन किया। परिवार की खुशहाली की कामना की।
हर वर्ष भाद्र मास शुक्ल पक्ष छटवी को देवछठ पर तुलसीवन मंदिर परिसर में लगने वाला यह ऐतिहासिक मेला बागों की मेले के नाम से जाना जाता है। तुलसीवन रोड जिस पर यह मेला भरता है, उस पर किसी जमाने में पेड़ पोधों से भरे हुए बाग ही बाग हुआ करते थे। ऐसे में कस्बे और ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने बच्चों के साथ देवछठ पर अपने पूर्वजों को याद करने के साथ वहां भोजन करते थे और दिन में बागों के बीच चाट-पकौड़ी का आनंद लेते थे। आज यह मेला केवल एक परिपाटी बन कर रह गया है।
कोरोना के खौफ के चलते हालांकि उपखंड प्रशासन द्वारा जिला प्रशासन के निर्देश पर मेले पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन यह प्रतिबंध केवल कागजी रूप में ही दिखाई दिया। मेले में मौका स्थिति का निरीक्षण करने ना तो कोई प्रशासनिक अधिकारी पहुंचा ना ही पुलिस जाब्ते ने मेले में जाकर स्थिति का जायजा लिया। ऐसे में मेले में आए लोगों में कोरोना का कोई खौफ दिखाई नहीं दिया और लोग आराम से भीड़ के रूप में अपने पूर्वजों को प्रसादी लगाने के साथ मंदिर के दर्शन करते हुए देखे गए। तुलसीवन का यह मेला सामूहिक रूप से स्वत ही लोगों के सहयोग से आयोजित है। इसमें ना तो कोई ट्रस्ट है और ना कोई कमेटी। ऐसे में शहर और ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में बने चबूतरों पर भोजन प्रसादी कराने के बाद परिवार सहित प्रकृति की हरियाली का आनंद लेते है। मेले में लगी दुकानों पर खरीददारी करते हैं, हालांकि इस बार मेले में अन्य वर्षो की तुलना में कम ही भीड़ दिखाई दी, लेकिन सुबह से शाम 4 बजे तक मेला आयोजित हुआ।

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