पहले मौसम की मार, अब फसलों को ये कर रहे बर्बाद

कभी जिंसों का उचित भाव ना मिलने तो कभी खड़ी फसलों की मौसम अथवा बीमारी की मार से आहत होने वाला अन्नदाता आजकल रबी फसलों को जंगली व गैर दुधारू शाकाहारी जानवरों के कहर से बचाने की जुगत में रात-दिन एक किए हुए है।

By: Mahesh Gupta

Published: 03 Jan 2020, 12:01 PM IST

पहले मौसम की मार, अब फसलों को ये कर रहे बर्बाद
धौलपुर/मनियां.कभी जिंसों का उचित भाव ना मिलने तो कभी खड़ी फसलों की मौसम अथवा बीमारी की मार से आहत होने वाला अन्नदाता आजकल रबी फसलों को जंगली व गैर दुधारू शाकाहारी जानवरों के कहर से बचाने की जुगत में रात-दिन एक किए हुए है। जिले में किसानों को रबी फसलों की बुवाईसे निवृत्ति के साथ ही उनकी पैदावार को सुरक्षित घरों तक लाने की चिंता सताने लगी है। रबी की सभी फसलें अंकुरित होकर काफी बड़ी हो चुकी हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जंगलों व चारागाहों के अभाव में जंगली व गैर दुधारू शाकाहारी जानवरों का विचरण आबादी सहित कृषि योग्य क्षेत्रों में दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। जंगलों व चारागाहों का जहां अभाव है वहीं इनके लिए इनमें खाद्य सामग्री भी अब पर्याप्त नहीं रही है। इसलिए यह जानवर पेट की आग शांत करने के लिए खेतों में खड़ी फसलों में अपना निवाला तलाशते हैं। ऐसी मवेशियों में किसानों द्वारा ही दूध देने के अयोग्य होने पर खुला छोड़ दी गई मवेशियों की संख्या ही अधिक दिखाईदेती है। फसलों को सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाले जंगली जानवरों में रोज-नील गाय आदि हैं। लेकिन दूध ना दे सकने वाली अथवा बूढ़ी गायों के साथ-साथ इनके बछड़े व सांडों की संख्या भी काफी है। यह गाय-बछड़े व सांड अपना जीवन आबादी क्षेत्रों से ही शुरू करते हैं इसलिए उपयोग में ना आने पर उन्हें खुला छोड़ दिए जाने पर वे जंगल की ओर नहीं जा पाते हैं और आबादी क्षेत्रों के आस-पास ही खेतों में अपना जीवन गुजारते हैं। इनके झुण्डों में रह कर फसलों को अपना चारा बनाने एवं खेतों में ही बैठे रहने से काफी बड़े भू-भाग की फसलें नष्ट हो जाती हैं। इन्हीं से बचाव के लिए इन दिनों किसान हाड़ कंपाऊं सर्दी में रात को भी खेतों पर ही मचान बनाकर डेरा डाले हुए है। खेतों में कृत्रिम मानव आकृति बनाकर उसे कपड़े भी पहना कर खड़ा किया हुआ है। इसे स्थानीय भाषा में बिजूका भी कहा जाता है।
किसानों का आरोप है कि शिकायतों के बाद भी प्रशासन द्वारा इस समस्या का कोईसमाधान नहीं नकिाला जा रहा है। तेजी से बढ़ते यह पशु किसानों के लिए मुसीबत का सबब बनते जा रहे हैं। किसानों को अब फसल उगाने की अपेक्षा इसकी सुरक्षा में ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। इनके प्रकोप से खेती को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। समीप वर्ती गांव बरेह मोरी के किसान राधेश्याम, महेश, हरिओम, राकेश, रामवीर, मनोज आदि ने बताया कि क्षेत्र में करीब 300 से अधिक खुले सांड विचरण कर रहे हैं जो दिन-रात खेतों में फसलों को क्षति पहुंचा रहे हैं। फसलों की सुरक्षा में जुटे किसानों की नजर खेतों से हटते ही सांड व गायों तथा आवारा पशुओं के झुण्ड खेतों में पहुंच जाते है।

Mahesh Gupta
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