दहेज बिना बुआ की शादी नहीं हो पा रही थी, अब निर्धन युवतियों को ब्याह रहा परिवार

आर्थिक तंगी के चलते बुआ की शादी नहीं हो पा रही थीं, यहां तक लडक़ा तलाशने के लिए पैसे तक के लिए तरसने वाला वहीं परिवार अब निर्धन युवतियों का ब्याह करा रहा है।

दहेज बिना बुआ की शादी नहीं हो पा रही थी, अब निर्धन युवतियों को ब्याह रहा परिवार
पिता से मिली प्रेरणा
राजस्थान, मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश के दो दर्जन से अधिक गांवों की सर्वसमाज की युवतियां शामिल
धौलपुर. आर्थिक तंगी के चलते बुआ की शादी नहीं हो पा रही थीं, यहां तक लडक़ा तलाशने के लिए पैसे तक के लिए तरसने वाला वहीं परिवार अब निर्धन युवतियों का ब्याह करा रहा है। अब तक यह परिवार राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के दो दर्जन से अधिक जिलों की 196 युवतियां का विवाह करा चुका है। इस बार भी 16 फरवरी को तीर्थराज मचकुण्ड परिसर में 51 जोड़ों की शादी करवाएगा। इसकी तैयारियां पूरी हो चुकी हंै।
खुद लेकर जाते हैं शगुन
अग्रवाल ने बताया कि जब जोड़ा तय हो जाता है तो लडक़ी वालों को शगुन (दूल्हन के कपड़े) तथा लगुन का सामान (लडक़े के सूट व राशि) खुद देने युवती के घर जाते हैं। जिससे वह अपने संस्कार निभा सकें।
सामूहिक विवाह सम्मेलन में करते हैं
धौलपुर में हर साल तीर्थराज मचकुण्ड में सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित करते हैं, जिसमें स्वर्णाभूषण से लेकर हर जरूरत का सामान (करीब दो लाख रुपए का) दिया जाता है, जिससे जिंदगी गुजर-बसर कर सके।
इन गांवों के जोड़े शामिल
करौली, मण्डरायल, श्योपुर, शिवपुरी, मासलपुर, गुबरेडा, करौली, भमपुरा धौलपुर, श्यामपुर, कसेड़, कैलादेवी, रघुनाथपुरा, ग्वालियर सहित दर्जन भर जिलों के गांवों की युवतियां शामिल हैं। इनमें अधिकांश अनाथ हैं।
जंगलों में तलाशते हैं निर्धन युवतियां
परिवार के सदस्य अनिल अग्रवाल ने बताया कि धनतेरस के दिन से दिन-रात जंगलों व गांवों में पैदल घूमकर अंतिम छोर पर रहने वाली युवतियां, जिसके विवाह की कोई उम्मीद नहीं होती है, ऐसी युवतियां को तलाश करते हैं। अच्छा लडक़ा तलाशने के लिए किराए आदि के लिए राशि के साथ तीन माह का समय देते हैं। एक मोबाइल देते हंै, जिससे लगातार मॉनिटरिंग करते हैं। वहीं शादी में दिए जाने वाले उपहार की सूची देते हैं, जिससे पक्के मकान व अच्छे घर का लडक़ा मिल जाए।
पिता बोरी ओढकऱ कर सोते थे
मूलत: धौलपुर निवासी अनिल के पिता स्वर्गीय नारायण दास फाकाकशी में आगरा चले गए थे, जहां पेठें की दुकान लगाने के दौरान एक मात्र रजाई भी आग में जल गई। इस पर पूरी सर्दी दम्पती बोरी ओढकऱ सोए थे। वहीं बहिनों की शादी के लिए पैसा नहीं होने की टीस दिल में चुभती रही। इस पर उन्होंने अपने चारों पुत्रों की शादी मंदिर में बिना दहेज की थी। साथ ही प्रेरणा दी कि ऐसों की मदद करों, जिनके पास सर्दी में ओढऩे को नहीं हो, जिसकी शादी में दिक्कत आ रही हो। अब चारों पुत्र बर्तन, ज्वैलर्स का काम है, वे हर साल ऐसी युवतियों की शादी करते हैं।
निर्धनों के बनवाते मकान, देते हैं गर्म कपड़े
अग्रवाल ने बताया कि वे जंगलों में जाते हैं तो झौपडिय़ों में मिलते हैं और कुछ खुले में सोते हुए। जरूरतमंदों को कमरा, दुकान बनवाते हैं। कुछ को मवेशी खरीदकर देते हैं, जिससे रोजगार मिल सके। वहीं आदिवासी इलाके में ठण्ड में ठिठुरते बच्चों व लोगों को रजाई व स्वेटर, जर्सी वितरित करते हैं।

Mahesh Gupta
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