बेदखली के आदेश के बाद से परेशान थे वनभूमि के बाशिंदे

जंगल की जमीन पर आदिवासियों के दावे अधिकारियों ने अस्वीकार कर दिए थे

By: amaresh singh

Published: 03 Mar 2019, 01:35 PM IST

डिंडोरी। उच्चतम न्यायालय ने आदिवासियों और वनवासियों को भारी राहत देते हुए उन्हें फिलहाल जंगल से बेदखल नहीं करने का आदेश दिया है। उच्चतम न्यायालय ने 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगाते हुए केंद्र और राज्य सरकार को फटकार लगायी और पंूछा कि अब तक क्यों सोते रहे। जंगल की जमीन पर इन आदिवासियों और वनवासियों के दावे अधिकारियों ने अस्वीकार कर दिए थे। पीठ ने इन राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे वनवासियों के दावे अस्वीकार करने के लिए अपनायी गई प्रक्रिया के विवरण के साथ हलफनामे कोर्ट में दाखिल करें। पीठ इस मामले में अब 30 जुलाई को आगे सुनवाई करेगी। जिले में वनाधिकार कानून को लेकर प्रशासन द्वारा किस तरह की लापरवाही बरती गई है वह लगभग एक दशक से अधिक समय से देखा जा रहा है। वनाधिकार कानून के तहत परंपरागत निवासियों को 13 दिसंबर 2005 के पूर्व कब्जा प्रमाणित होने पर उन्हें अधिकार पत्र दिया जायेगा इसके साथ ही गैर परंपरागत निवासियों को भी अधिकार पत्र देने के लिये अलग नियम रहे हैं लेकिन यहां कानून बनने के बाद से ही लगातार वन भूमि में काबिज अपना प्रमाण लेकर जिला कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं पर उनकी सुध आज तक किसी ने नहीं ली। वैसे वन भूमि पर कब्जे के अधिकांश मामले विशेष पिछडी जनजाति के हैं जो पीढियों से वन भूमि में रह अपना भरण पोषण कर रहे हैं 2008 से कानून के क्रियान्वयन के समय से ही बडी संख्या में आवेदक वनभूमि पर पट्टा की मांग लेकर पहुंचते हैं। इनके पास 2005 से पूर्व की काबिजी के प्रमाण भी हैं। बावजूद इन ग्रामीणों के आवेदन पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट व्दारा देश में वनभूमि पर काबिज लगभग 12 लाख आदिवासी एवं परम्परागत वन निवासी की बेदखली का आदेश केंद्र के ढुलमूल रवैये एवं कोर्ट के सामने सही तथ्य नहीं रखने के चलते आया, इसमें सबसे अधिक 3,54,787 खारिज दावे म. प्र. में है। यह बेदखली आदिवासियों पर बहुत बड़ा कहर लाएगी, कई संगठनों ने इस फैसले को आदिवासी एवं जंगल दोनों के हितों के खिलाफ बताया क्योंकि, आदिवासी बचेगा तो जंगल बचेगा और जंगल बचेगा तो आदिवासी बचेगा। इन समूहों ने कहा कि कोर्ट के इस आदेश से आदिवासी वर्ग में भय और रोष है। जिले के परिपेक्ष्य में यदि देखें तो अभी तक कुल 12 हजार 26 जनजातीय दावे के विरूद्ध 7 हजार 197 दावों पर हक वितरित किया गया है। जिसमें कुल 12 हजार 9 सौ हैक्टेयर भूमि शामिल है। इसी तरह अन्य परंपरागत निवासियों के दावों में 704 प्राप्त दावों के विरूद्ध 23 को ही लगभग 50 हेक्टेयर भूमि का हक दिया गया है। जबकि कुल 5 हजार 510 दावे निरस्त कर दिये गये हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद साढे पांच हजार वासिंदे अधर में लटक जायेंगे। अब इसके उलट दूसरी तस्वीर पर नजर डालें तो तत्कालीन एसडीएम पीके सेन गुप्ता द्वारा 2016-17 में स्वीकार किया गया था कि दावों का सही परीक्षण न करते हुये निरस्त किया गया है। इस दौरान निरस्त होने वाले दावों की संख्या काफी अधिक रही है निरस्त दावों का परीक्षण किया गया तो बडे पैमाने पर वह स्वीकृत हुये उस दौरान डिंडौरी अनुभाग में ही 1224 निरस्त किये गये दावों का पुनर्परीक्षण करने पर 896 पात्र पाये गये जिन्हें पुन: खण्ड स्तरीय समिति से अनुमोदन कराया अधिकार पत्र वितरित किया गया।

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