script जानिए क्या है टाइप-1 डायबिटीज, किशोर ज्यादा प्रभावित | Know what is Type 1 diabetes, teenagers are more affected | Patrika News

जानिए क्या है टाइप-1 डायबिटीज, किशोर ज्यादा प्रभावित

locationजयपुरPublished: Dec 28, 2023 03:18:04 pm

Submitted by:

Jaya Sharma

देश में डायबिटीज के कुल रोगियों में टाइप-1 के 3-4% रोगी हैं। टाइप-2 डायबिटीज मुख्य रूप से वयस्कों में होती है जबकि टाइप-1 बच्चों-किशोरों में होने वाली बीमारी है। इसमें शरीर में इंसुलिन की मात्रा बहुत कम या नगण्य हो जाती है। इसलिए बाहर से इंजेक्शन से इंसुलिन दिया जाता है।

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टाइप-1 के प्रमुख कारण

आनुवांशिक, ऑटो इम्युन यानी शरीर को सुरक्षा देने वाले सेल्स ही नुकसान पहुंचाने लगे और वातावरण। टाइप-1 डायबिटीज के बच्चों के भाई-बहन को डायबिटीज होने का 5 प्रतिशत खतरा होता है। बात करें वातावरणीय कारणों की तो कुछ वायरस और रासायनिक पदार्थ से भी होता है।
समय पर इलाज क्यों जरूरी

यदि डायबिटीज के शुरुआती दिनों में कोई ऐसी दवा दे दी जाए जो बीटा कोशिकाओं को नुकसान होने से बचा सके तो यह संभव है कि इलाज में इंसुलिन की मात्रा काफी कम हो जाए। ऐसा कर अन्य गंभीर दुष्प्रभावों को रोक सकते हैं।
अन्य गंभीर दुष्प्रभाव
टाइप-1 डायबिटीज ज्यादातर 14 वर्ष की आयु के आसपास देखने में आती है। 35 वर्ष की आयु के नीचे वाले लोगों में होने वाली डायबिटीज में से 80% टाइप-1 होती है। ज्यादातर रोगी दुबले-पतले होते हैं। आनुवांशिक गुणों पर वातावरण के दुष्प्रभाव से बीटा कोशिकाओं में ऑटोइम्यून की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और बीटा कोशिकाएं नष्ट होने से शरीर में इंसुलिन खत्म होने लगता है।
बच्चों एवं परिजनों के लिए निर्देश

माता-पिता बच्चों के साथ नियमित वॉक करें, उन्हें व्यायाम, स्पोर्ट्स के लिए प्रेरित करें। रोज उन्हें 4,000 कदम चलाएं। छुट्टी वाले दिन सभी सदस्य साथ-साथ पार्क या खुली जगह जाएं। कार गंतव्य से कुछ दूर पार्क करें, ताकि पैदल चल सकें। दूकान-स्कूल-ऑफिस जहां भी संभव हो लिफ्ट का उपयोग न करें। सीढ़ी से चढ़ें, लंबे रास्ते से पैदल जाएं। पानी पीने या टॉयलेट के लिए उठें, तो कुछ देर चलें। डांस, एनसीसी, स्काउटिंग, एनएसएस, समाज सेवा जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए बच्चों को प्रेरित करें।
ज्यादा हाइजीन भी सही नहीं

विकसित राष्ट्रों में स्वच्छता (हाइजीन) पर ज्यादा ध्यान देने से वहां संक्रामक रोगों में कमी तो हो रही है, लेकिन ऑटोइम्यून बीमारियां बढ़ी हैं। जरूरत से ज्यादा हाइजीन से एलर्जी, एटोपी, ऑटोइम्यून डिजीज, टाइप-1 डायबिटीज भी बढ़ने लगती हैं। इसलिए बच्चों को साफ-सफाई पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करें लेकिन जरूरत से ज्यादा हाइजीन के लिए दबाव न बनाएं।

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