जीका, डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया में कौनसा बुखार है ज्यादा खतरनाक ?

जीका, डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया में कौनसा बुखार है ज्यादा खतरनाक ?

किसी भी बीमारी के सही इलाज के लिए उसकी पहचान व कारणों को जानना जरूरी होता है। वैसे तो जीका वायरस, डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया मच्छरों से होने वाले रोग हैं

किसी भी बीमारी के सही इलाज के लिए उसकी पहचान व कारणों को जानना जरूरी होता है। वैसे तो जीका वायरस, डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया मच्छरों से होने वाले रोग हैं लेकिन इनकी पहचान आवश्यक है।

डेंगू:

यह एडीज मच्छर के काटने से होता है। लेकिन इसके मरीज में कॉम्पलीकेशन रेट ज्यादा होती है।

यह दो प्रकार का होता है - एक डेंगू फीवर और दूसरा डेंगू शॉक सिंड्रोम। डेंगू शॉक सिंड्रोम में ब्लड प्रेशर व प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं जिससे हेमरेजिक फीवर हो जाता है। इससे शरीर में इंटरनल ब्लीडिंग होने लगती है जिससे मरीज की जान तक जा सकती है। इसके मुख्य लक्षणों में तेज बुखार रहना, ललाट पर और आंखों के पीछे दर्द रहता है, ब्रेक बोन फीवर रहता है जिसे हड्डी तोड़ बुखार भी कहा जाता है। कमर दर्द भी काफी रहता है। इसके इलाज में देरी या मरीज लापरवाही बरतता है तो स्थिति बिगड़ जाती है। अपनी मर्जी से बिना डॉक्टर को दिखाए दवाएं खाना भी खतरनाक होता है। खासकर ये दवाइयां बिना डॉक्टरी सलाह के न लें जैसे- आइब्युफेन, कॉम्बीफ्लाम या एस्प्रिन तो इनके साइड इफेक्ट से भी प्लेटलेट्स गिरने लगते हैं। इसके मरीज में बुखार उतरने के 5-7 दिन बाद भी प्लेटलेट्स कम होते हैं और 24 से 48 घंटे का समय क्रिटिकल फेज माना जाता है। इसमें प्लेटलेट्स काउंट गिरने के साथ ब्लड प्रेशर भी कम होता है लेकिन इसके बाद अपने आप प्लेटलेट्स बढऩे लगते हैं जो कि शरीर के नेचुरल डिफेंस मैकेनिज्म का हिस्सा है। अधिकतर मरीज व परिजनों के मन में प्लेटलेट्स चढ़ाने को लेकर भ्रम की स्थिति रहती है लेकिन गाइडलाइन कहती है कि बीस हजार से कम प्लेटलेट्स हैं और ब्लीडिंग नहीं हुई है तो इन्हें चढ़ाना होता है। यदि ब्लीडिंग हो गई है तो पचास हजार काउंट से कम पर भी प्लेटलेट्स चढ़ाई जाती है।

डेंगू में जल्दी से प्लेटलेट्स क्यों नहीं चढ़ाते हैं
विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर में प्लेटलेट्स फ्यूल का काम करते हैं और जैसे ही शरीर में नए प्लेटलेट्स पहुंचते हैं इनका दोगुनी गति से नष्ट होना शुरू हो जाता है। प्लेटलेट्स बढ़ाने की कोई दवा नहीं आती है और मरीज का लक्षणों के आधार पर इलाज होता है जिसमें ओआरएस का घोल व पैरासिटामोल दवा दी जाती है।

चिकनगुनिया
चिकनगुनिया के मरीज की हड्डियों में भी तेज दर्द होता है लेकिन इसमें छोटे व बड़े दोनों जोडो़ं का दर्द होता है।कमर दर्द भी होता है जिससे मरीज की स्थिति रोबोट जैसी हो जाती है। इसका कोई विशेष उपचार नहीं है। लक्षणों के आधार पर दर्द कम करने के लिए ट्रेमाडोल, पैरासिटामोल जैसी एनालजेसिक दवाएं व फ्लयूड दिए जाते हैं।

मलेरिया

मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। इसके संक्रमण का असर लंबे समय तक रह सकता है। फाल्सीफेरम मलेरिया, वाइवेक्स और ओवेल समेत यह चार तरह का होता है । भारत में फाल्सीफेरम व वाइवेक्स के मरीज ज्यादा होते हैं। फाल्सीफेरम को ब्लैक बटर फीवर भी कहते हैं। इसमें यूरीन का कलर बिलकुल काला हो जाता है जो कि शरीर में हीमोलाइसिस होने के कारण होता है। वाइवेक्स के लक्षण भी इसी तरह के हो गए हैं। मलेरिया के मरीज को पीलिया भी हो जाता है। इसमें भी प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं। मलेरिया की टाइप के अनुसार बुखार काफी तेज रहता है। बुखार एक दिन छोड़कर एक दिन अथवा दो या तीन दिन छोड़कर एक दिन आता है। यदि यह बुखार दिमाग में चढ़ जाता है तो इसे सेरिब्रल मलेरिया कहते हैं।

जीका में आता है लो ग्रेड फीवर
अभी तक के मामलों में मरीजों में ज्यादा तेज बुखार नहीं देखा गया है। इसके मरीज को पर्याप्त मात्रा में पानी व तरल चीजें लेनी चाहिए। इससे शरीर में आवश्यक मिनरल्स का बैलेंस बना रहेगा और हाथ-पैरों में दर्द, जी मिचलाना, उल्टी जैसी परेशानी नहीं होगी। हालांकि जीका के मरीज में जो हाथ-पैरों व जोड़ों का दर्द होता है वो चिकनगुनिया के मुकाबले कम होता है। जीका वायरस के मरीज को बाहर के खानपान से बचना चाहिए। अधिक घी वाला व ऑयली फूड भी नहीं लेना चाहिए।

इन जांचों से पता चलता है जीका वायरस का
पीसीआर टेस्ट, एलिजा टेस्ट, आईईजी हीमोग्लोबिन जांच कराई जाती है। ब्लड का आरटीपीसीआर (रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज पीसीआर) करते हैं। यूरीन में भी आरटीपीसीआर करते हैं। एंटीबॉडी टेस्ट आईजीएम , पीआरएएमटी (प्लेग रिडक्शन एंटीबॉडी टेस्ट) करते हैं। ये जांचें वायरोलॉजी लैब में ही की जाती हैं।

गर्भवती के साथ

जीका वायरस गर्भवती महिलाओं के लिए खतरनाक माना जाता है क्योंकि इससे उनके गर्भस्थ शिशु को नुकसान हो सकता है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि गर्भावस्था के किस महीने में जीका वायरस का संक्रमण हुआ है। शुरुआती तीन महीने, बीच के और अंतिम तीन महीनों के हिसाब से इसके कॉम्पलीकेशन अलग अलग होते हैं।

मस्तिष्क का विकास नहीं हाेता

गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीनों में मां से शिशु में इसके संक्रमण का असर जाने की आशंका लगभग 59 फीसदी होती है। इसके दुष्प्रभाव से शिशु के मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है। इसमें ब्रेन में कैल्शियम जमा हो जाता है। शिशु की सुनने की क्षमता भी विकसित नहीं हो पाती है। उसे आंखों संबंधी तकलीफ भी हो सकती है यहां तक कि उसे जन्म के बाद आंखों से दिखाई देना भी बंद हो सकता है। ये दिक्कतें बाकी दो तिमाही में भी हो सकती हैं लेकिन इनकी आशंका दूसरी में 52 फीसदी और तीसरी में 51 फीसदी के आसपास शिशु में संक्रमण जाने का खतरा रहता है।

सीमेन में जीका वायरस

पुरुषों के सीमेन से भी फैल सकता है जीका वायरस क्योंकि ये उसमें मौजूद रहता है। इसलिए यौन संबंधों के लिए मना किया जाता है।

Ad Block is Banned