झारखंड में 15000 लड़कियां बनी मानव तस्करी का शिकार

ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के लिए चलाई जा रही योजना मनरेगा में भी महिलाओं को हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही है।

By: इन्द्रेश गुप्ता

Published: 15 Dec 2016, 12:22 PM IST

दुमका। एक आकंड़ें के अनुसार देश की 31 प्रतिशत महिलाएं ही घर की देहरी लांघ कर धन कमा पाती हैं। 69 प्रतिशत महिलाएं ही रोजगार में लगी हैं। ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के लिए चलाई जा रही योजना मनरेगा में भी महिलाओं को हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही है।

जिसे देखते हुए प्रदेश में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने डेढ़ साल पहले अनूठी पहल शुरू की थई। कस्तूरबा गांधी विद्यालय में नामांकन के समय छात्राओं के अभिभावक एक शपथ-पत्र भरते हैं, जिसमें लिखना पड़ता है कि वे प्लस टू तक की पढ़ाई कराने के बाद ही अपनी बेटी की शादी करेंगे।

जानकारी के अनुसार, यह शपथ तोड़ने पर बेटियां खुद ही माता-पिता की शिकायत लेकर प्राचार्य के पास पहुंचती हैं। शिक्षकों के समझाने-बुझाने पर नहीं मानने पर पंचायत बुलाई जाती है। अभिभावकों को अपने बच्चे की पढ़ाई नहीं छोड़ने देने के लिए मजबूर किया जाता है।

ट्रैफिकिंग एक बडी समस्या

ट्रैफिकिंग से पार पाना एक अनुमान के मुताबिक झारखंड की लगभग 15 हजार लड़कियां ट्रैफिकिंग की शिकार हैं। सरकार इस मोर्चे पर कुछ खास नहीं कर पाई है। रबी फसल नहीं होने से लोग इस सीजन में काम की तलाश में दूसरे प्रदेशों में जाते हैं। मां-बाप के साथ ही ईंट भट्ठों में उनके बचपन की बलि चढ़ जाती है। वे घरेलू नौकरानी के रूप में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में चली जाती हैं। पलायन का यह सिलसिला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर होता रहता है।

69 प्रतिशत ही रोजगार वाली महिलाएं

हालांकि यह सरकारी अभियान प्रदेश में सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है। केंद्र सरकार के अभियान बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ को पहले पढ़ाई, फिर विदाई की ही कड़ी माना जाता है। बालिकाओं का ड्रॉपआउट रोकने के लिए मुख्यमंत्री विद्या लक्ष्मी योजना शुरू की गई।

एससी-एसटी समुदाय की बालिकाओं को पांचवीं उत्तीर्ण करने के बाद उनके नाम से बैंक या पोस्ट ऑफिस में दो हजार की राशि फिक्स डिपॉजिट की जा रही है। इसके तहत 2015-16 में 75 हजार एसटी और 45 हजार एससी समुदाय की बालिकाओं को लाभ मिला।

57 प्रखंडों में नए कस्तूरबा विद्यालय खोले जाएंगे

57 प्रखंडों में नए कस्तूरबा गांधी विद्यालय खोले जा रहे हैं। इन विद्यालयों की 10 हजार छात्राओं को टैबलेट दिया गया। झारखंड का विकास चक्र अलग-अलग मानदंडों की राह पर कहीं मंद व अर्धचेतन गति से चल रहा है। दो साल में महिला शिक्षा के मोर्चे पर हजारों साल की जड़ता टूटी है।
इन्द्रेश गुप्ता
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