script345 newborn deaths in Dungarpur in last one year | हर रोज एक नवजात तोड़ रहा दम | Patrika News

हर रोज एक नवजात तोड़ रहा दम

डूंगरपुर जिले में हर रोज एक नवजात शिशु की मौत हो रही है। आदिवासी बहुल जिला होने से यह हाई फोकस जोन में शामिल है। प्रसूति एवं बाल स्वास्थ्य के नाम पर करोड़ों रुपए का बजट होम रहा है, बावजूद नवजातों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा। हालांकि बच्चों की मौत के पीछे मुख्य कारण गर्भवती माताओं में खून की कमी होना बताया जा रहा है।

डूंगरपुर

Published: January 07, 2020 11:13:33 am

हर रोज एक नवजात तोड़ रहा दम
- डूंगरपुर में पिछले एक साल में 345 नवजात शिशुओं की मौत
- अकेले जिला अस्पताल में 166 बच्चे मरे
डूंगरपुर.
डूंगरपुर जिले में हर रोज एक नवजात शिशु की मौत हो रही है। आदिवासी बहुल जिला होने से यह हाई फोकस जोन में शामिल है। प्रसूति एवं बाल स्वास्थ्य के नाम पर करोड़ों रुपए का बजट होम रहा है, बावजूद नवजातों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा। हालांकि बच्चों की मौत के पीछे मुख्य कारण गर्भवती माताओं में खून की कमी होना बताया जा रहा है।
हर रोज एक नवजात तोड़ रहा दम
हर रोज एक नवजात तोड़ रहा दम

यह है स्थिति
डूंगरपुर जिले में पिछले एक वर्ष के दरम्यान जन्म से माह तक की आयु के 345 शिशुओं की मृत्यु हुई है। इसमें भी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध श्री हरिदेव जोशी सामान्य चिकित्सालय की मातृ एवं शिशु विंग में 166 बच्चे मरे हैं। इसके अलावा डूंगरपुर में पिछले एक साल के दौरान 0 से 1 वर्ष तक की आयु के 623 मासूमों ने दम तोड़ा है।
10 में से 7 गर्भवती माताएं एनीमिक
डूंगरपुर में कुपोषण बहुत बड़ी समस्या है। चिकित्सा सूत्रों की मानें तो हर 10 में से 7 गर्भवती माताएं एनीमिक (खून की कमी) से पीडि़त हैं। गर्भवती माताओं के पोषण को लेकर की जा रही कवायदें बौनी साबित हो रही हैं। ऐसी माताओं से जन्म लेने वाले शिशु भी बहुत कमजोर होते हैं। समय पर चिकित्सा सुविधा तथा अच्छा वातावरण नहीं मिलने पर शिशु जीवित नहीं रह पाते।
संक्रमण का भी खतरा
जिला अस्पताल में अभी कुछ साल पहले ही करोड़ों रुपए की लागत से मातृ एवं शिशु विंग का निर्माण हुआ है। कहने को तो यह आधुनिक भवन है, लेकिन पहली ही बारिश में निर्माण में गुणवत्ता की कलई खुल गई थी। बारिश के दिनों भवन के ऊपरी माले में नालदे के रूप में पानी गिरता है। इसके अलावा दीवारों पर सीलन की भी समस्या है। वैसे तो अस्पताल में साफ-सफाई नियमित हो रही है, लेकिन लोग गंदगी फैलाने से बाज नहीं आते। शौचालयों की स्थिति शराब है। वार्डों में लोग जूते-चप्पल पहन कर घुमते हैं। वहीं मरीजों के परिजन बेड के पास ही बैठकर खाना-पीना भी करते हैं। इससे शिशुओं में संक्रमण का खतरा बना रहता है।
एक मरीज, 10 परिजन
गायनिक और शिशु वार्डों की स्थिति यह है कि वहां मरीज कम और परिजन ज्यादा नजर आते हैं। एक-एक बेड के आसपास 10 से 12 लोग बैठे रहते हैं, जबकि मरीज के साथ सिर्फ एक परिजन भी पर्याप्त है। बहुत अधिक संख्या में वार्ड में लोगों की मौजूदगी के चलते भी संक्रमण की आशंका बन रहती है।
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नवजात शिशुओं की मृत्यु में मुख्य कारण प्री मैच्योर डिलेवरी रहती है। समय से पहले प्रसव होने पर बच्चा बहुत कमजोर होता है। कई बच्चे 800 से 1000 ग्राम वजन के भी जन्म लेते हैं, वे सरवाईव नहीं कर पाते हैं। शिशुओं के कमजोर होने के पीछे मुख्य कारण माताओं का एनीमिक होना है। इसके अलावा बच्चों में अंतराल नहीं रखने से भी कमजोर शिशु पैदा होते हैं। डूंगरपुर में यह समस्या बहुत अधिक है। जहां तक एक साल की आयु तक के बच्चों की मृत्यु का सवाल है तो उसमें निमोनिया और संक्रमण मुख्य कारण रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश लोग शिशु की ठीक से देखभाल नहीं करते। इससे सर्दी जुकाम होने पर समय पर उपचार नहीं कराने से निमोनिया हो जाता है। बच्चे को जब तक उच्च चिकित्सा संस्थान पर लाया जाता है, तब तक उसकी स्थिति गंभीर हो चुकी होती है।
डा. निलेश गोठी, विभागाध्यक्ष, शिशु रोग, एमसीएच, डूंगरपुर

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