डूंगरपुर. भक्ति और उल्लास का पर्व गणेशोत्सव डूंगरपुर जिले में सदियों से बनाया जा रहा है। पहले व्रतार्थी लोग घर-घर में मिट्टी की गणेश आकृति बनाकर उसकी स्थापना कर पूजा अर्चना करते थे। जिले से रोजगार के लिए मुंबई गए लोगों ने वहां गणेशोत्सव की भव्यता देखी तो उससे प्रभावित होकर डूंगरपुर जिले में इसकी शुरूआत की। 1952 में सबसे पहले दामड़ी कस्बे में सार्वजनिक तौर पर गणेशोत्सव का आयोजन शुरू हुआ। उत्सव को जिला मुख्यालय तक लाने का श्रेय भी दामड़ी के शारदा हेवी इंजीनियरिंग वक्र्स परिवार को ही जाता है। धीरे-धीरे यह उत्सव पूरे जिले का महोत्सव बना। प्रारंभिक दौर में छोटी प्रतिमाएं लाई जाती थी। बाद में गणेश मंडलों की एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा की होड़ ने प्रतिमाओं का आकार और संख्या बढ़ा दी। दूसरी ओर शहर के लाभ गणेश मंदिर और धनेश्वर मंदिर मंडलों ने परंपरा से समझौता नहीं किया और मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित करने का क्रम जारी रखा। पर्यावरण संरक्षण और जलस्त्रोतों को संरक्षित करने की समय-समय पर चली मुहिमों ने ईको फ्रेण्डली गणेशोत्सव का नया शब्द इजाद किया। घाटी गणेश मंडल ने मिट्टी और बांस की खपच्चियों से सुंदर प्रतिमाएं बनाने की शुरूआत की। वर्ष 2015 में राजस्थान पत्रिका ने अनूठी पहल करते हुए धातु की गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने की अपील की। नगरपरिषद ने भी प्रोत्साहन की घोषणा की। शास्त्री कॉलोनी गणेश मंडल ने उसे हाथों हाथ लेते हुए उसी सत्र धातु की प्रतिमा स्थापित की। धीरे-धीरे अब शहर में चार से पांच जगह धातु की प्रतिमा स्थापित हो रही हैं।

मिट्टी के मूल स्वरुप में स्थापित करते हैं प्रतिमा
गणेशोत्सव की शुरूआत भले दामड़ी से हुई हो, लेकिन डूंगरपुर में इसे भव्यता के साथ आयोजित करने की शुरूआत दर्जीवाड़ा के केशव मंडल ने की। मंडल पिछले 28 सालों से गणेशोत्सव मना रहा है। इसमें पिछले कुछ सालों से ईको फ्रेण्डली प्रतिमा स्थापित की जाती है। मंडल के अध्यक्ष राजू पंचाल ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए अब स्थानीय कलाकारों से मिट्टी की मूर्ति बनवाई जाती है तथा उसे मूल रूप में ही स्थापित किया जाता है। कई बार तो उस पर किसी प्रकार के प्राकृतिक रंग तक नहीं कराते हैं।

पत्रिका के आह्वान पर की थी शुरूआत
शास्त्री कॉलोनी गणेश मंडल ने वर्ष 2015 में पत्रिका के आह्वान पर पहली बार धातु की प्रतिमा स्थापित की थी। मण्डल के हितेश चौबीसा बताते हैं कि जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए मंडल ने अष्ट धातु की प्रतिमा बनवाई। उसी की स्थापना की जाती है। विसर्जन के दिन जलाशय के पानी से अभिषेक प्रतिमा को वापस मंदिर में विराजित कर दिया जाता है। शास्त्री कॉलोनी के बाद मोचीवाड़ा के श्रद्धानंद गणपति मंडल ने भी इसकी पहल की। मंडल पिछले तीन साल से धातु की प्रतिमा स्थापित करता आ रहा है। मंडल अध्यक्ष भुपेंद्र पालीवाल ने बताया कि तीन साल पहले चार फीट ऊंची धातु की प््रतिमा बनवाई। उसी की स्थापना की जाती है। दस दिन तक उत्सवी माहौल रहता है। क्षेत्र के सभी बुजुर्ग, युवा, बच्चों, महिलाओं का सहयोग मिल रहा है।

लाभ गणेश, धनेश्वर मंडल ने बनाए रखी परंपरा
शहर के प्राचीन धनेश्वर मंदिर और लाभ गणेश मंदिर ने पिछले चार-पांच दशक से मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा को जीवित रखा है। दोनों मंडलों की प्रतिमाएं शिल्पकार सत्यनारायण सोमपुरा व लक्ष्मीशंकर सोमपुरा बनाने आ रहे थे। पिछले दो साल से सत्यनारायण सोमपुरा का स्वास्थ्य सही नहीं होने से अब अन्य शिल्पकार बना रहे हैं। वहीं लक्ष्मीशंकर का स्वर्गवास होने से उनके पुत्र प्रतिमा बना रहे हैं। लाभ गणपति के अध्यक्ष गोपाल कंसारा ने बताया कि मण्डल की ओर से १९७६ से मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की जा रही है। मण्डल में लक्ष्मीलाल दोशी, भगवत कंसारा, प्रभुलाल कंसारा, नारायणलाल भाटिया का सहयोग रहता है। वहीं धनेश्वर मंडल में भारतनंदन पुरोहित, शार्दूल चौबीसा, नगीनभाई दर्जी, राजेेंद्र रावल सहित कई वरिष्ठ जन जुड़े हुए हैं।

नई पीढ़ी में घाटी मंडल ने की शुरूआत
दोनों प्रमुख मंदिरों के अलावा घाटी गणेश मंडल ने वर्ष २०१० में ईको फ्रेण्डली गणेशोत्सव की शुरूआत की। मंडल की ओर से हर साल मिट्टी व बांस की खपच्चियों से आकर्षक प्रतिमा बनाई जाती है। घाटी मण्डल के अध्यक्ष हिमांशु चौबीसा ने बताया कि मंडल हमेशा ईको फ्रेण्डली प्रतिमा बनाता है। पिछले कुछ सालों से मण्डल के महेश, पवन, शंकर, आशिष, मनीष, तन्मय व हिमांशु उदयपुर में पढाई कर रहे हैं। पढाई से समय बचने के पश्चात कमरे में गणेश प्रतिमा बना रहे हैं और वहां से मण्डल सदस्य गाड़ी में लाते हैं।

घर-घर बनती हैं मिट्टी की प्रतिमाएं
पीओपी की प्रतिमाओं की बिक्री प्रतिबंधित किए जाने के बाद मिट्टी की प्रतिमाओं की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठे। तब शहर के सोमपुरा समाज के मूर्तिकारों ने इस रिक्तता को पाटने का भरपूर प्रयास किया। पहले भी यह कलाकार घरों पर छोटी मिट्टी की प्रतिमाएं बनाकर स्थापित करते थे। लोगों की ओर से मांग उठने पर उन्होंने इसे स्वीकार कर प्रतिमाएं बनाना शुरू किया। वर्तमान में घर-घर कई कलाकार मिट्टी की प्रतिमाएं बना रहे हैं। धर्मेंद्र सोमपुरा ने तो इसे प्रोफेशनल अंदाज में लेते हुए रोजगार के नए साधन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। बांसड़ समाज ने भी पिछले दो साल से बांस के टोपलों से गणेश प्रतिमा बनाना शुरू किया है।

 

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned