रक्तदाताओं ने लिखी कई लोगों के जीवन की नई इबारत

डूंगरपुर.
आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले में स्वैच्छिक रक्तदान बहुत बड़ी चुनौती रहा है। आज डूंगरपुर ब्लड बैंक हर साल 2500 से अधिक युनिट रक्त एकत्र करता है, एक दौर ऐसा भी था कि रक्त की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ता था और सैकड़ों लोग सिर्फ खून नहीं मिलने से दम तोड़ देते थे। अब हालात ऐसे नहीं रहे हैं। रक्तदान को लेकर यह बदलाव एक दिन या एक माह में नहीं आया। इसके पीछे दशकों की मेहनत और संघर्ष है। विश्व रक्तदाता दिवस पर डूंगरपुर में रक्तदान को लेकर बदली स्थितियों पर विशेष रिपोर्ट...।

By: Harmesh Tailor

Published: 14 Jun 2020, 06:36 PM IST

रक्तदाताओं ने लिखी कई लोगों के जीवन की नई इबारत
- डूंगरपुर में पिछले एक दशक में बदला रक्तदान के प्रति नजरिया
- विश्व रक्तदाता दिवस पर विशेष
डूंगरपुर.
आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले में स्वैच्छिक रक्तदान बहुत बड़ी चुनौती रहा है। आज डूंगरपुर ब्लड बैंक हर साल 2500 से अधिक युनिट रक्त एकत्र करता है, एक दौर ऐसा भी था कि रक्त की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ता था और सैकड़ों लोग सिर्फ खून नहीं मिलने से दम तोड़ देते थे। अब हालात ऐसे नहीं रहे हैं। रक्तदान को लेकर यह बदलाव एक दिन या एक माह में नहीं आया। इसके पीछे दशकों की मेहनत और संघर्ष है। विश्व रक्तदाता दिवस पर डूंगरपुर में रक्तदान को लेकर बदली स्थितियों पर विशेष रिपोर्ट...।
भीड़ भगाने का मंत्र था रक्तदान
जनजाति बहुल डूंगरपुर जिले में रक्तदान का नाम सुनते ही लोग सहम जाते थे। चिकित्सक की ओर से रक्तदान की जरूरत बनाते पर अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती मरीज को लावारिस छोड़ कर परिजन भाग जाते थे। कई बार दुर्घटना या गंभीर बीमार मरीज के इलाज में बाधक बनने वाली परिजनों की भीड़ को छांटने के लिए भी चिकित्सक रक्तदान का शगूफा छोड़ देते थे।
अब बदली स्थितियां
जिले में ब्लड बैंक स्थापित होने के बाद भी करीब डेढ़ दशक तक रक्तदान को लेकर जागरूकता की कमी के चलते स्वैच्छिक रक्तदान बहुत कम हो पाता था। वर्ष २०११ में जिला प्रशासन और महावीर इंटरनेशनल की संयुक्त मुहिम के बाद रक्तदान में तेजी आई। स्थितियां यह हैं कि वर्ष २०११ में जहां पूरे साल में ६६८ युनिट रक्तदान हुआ, वहीं वर्ष २०१९ में यह आंकड़ा २८९० युनिट तक पहुंच गया।
यंू बढ़ा कारवां
यह है आंकड़े
वर्ष.................. यूनिट

2011................. 668
2012.................. 994
2013 ...................1193
2014 ...................1578
2015 .....................1306
2016 ....................1582
2017...................... 2131
2018 ......................2133
2019........................ 2890

१३ जून २०२० तक ११४५
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यह हैं जिले के प्रमुख रक्तदाता
डूंगरपुर जिले के प्रमुख रक्तदाताओं में सबसे पहला नाम रक्तदान अभियान जिला संयोजक पद्मेध गांधी का आता है। उन्होंने स्वयं ५६ बार रक्तदान किया, वहीं हजारों लोगों को प्रेरित किया। इनके अलावा पेशे से छात्रावास अधीक्षक मोहन कोटेड़ अब तक ५४ बार रक्तदान कर चुके हैं तथा जनजाति समुदाय में रक्तदान के प्रति जागृति लाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इसी प्रकार महावीर इंटरनेशनल के पूर्व सचिव हर्षवद्र्धन जैन 49 बार, नूर मोहम्मद मकरानी 2७ बार, वरुण गांधी 24 बार, हसमुख जैन 22 बार तथा सुनील भठीजा 20 बार रक्तदान कर चुके हैं।
पत्रिका के सांझे में हुआ अब तक का सबसे बड़ा रक्तदान शिविर
जिले में अब हर साल दर्जनों रक्तदान शिविर होते हैं। सर्वाधिक युनिट रक्तदान की दृष्टि से जिले में अब तक का सबसे बड़ा शिविर दो फरवरी २०१९ को सागवाड़ा के जील हॉस्पीटल में राजस्थान पत्रिका की मीडिया पार्टनरशिप में हुआ था। इसमें सर्वाधिक ५७६ युनिट रक्तदान हुआ। इसके अलावा पिंडावल पीएचसी प्रभारी नागेंद्रसिंह के नेतृत्व मेंं २५ अक्टूबर २०१७ को ५७१ यूनिट रक्तदान हुआ था।
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ब्लड बैंक टीम भी मुस्तैद
जिले में रक्तदान के प्रति बढ़ी जागरूकता में ब्लड बैंक टीम का भी बहुत बड़ा योगदान है। ब्लड बैंक प्रभारी डा. वंदना सिंघल के निर्देशन में लेब प्रभारी राजेंद्र सेवक और उनकी टीम रक्तदान शिविर में सेवाएं देती है। टीम 100 किमी दूर तक भी जाकर शिविरों में पूर्ण योगदान देती है।
कई संगठन जगा रहे रक्तदान की अलख
डूंगरपुर जिले में कई संगठन रक्तदान की अलख जगा रहे हैं। महावीर इंटरनेशनल, विवेकानंद युवा संस्थान बरबोदनिया, एमएमबी गु्रप, पूज्य सिंधी पंचायत, निरंकारी मंडल पूंजपुर, रॉयल ग्रु्रप जैसे संगठन जिले में निरंतर रक्तदान की अलख जगा रहे हैं। रॉयल गु्रप जनजाति समुदाय में रक्तदान को लेकर जनजागरण के लिए कार्यरत है। गु्रप की ओर में 50 सक्रिय सदस्य तथा 300 रक्तदाता जुड़े हुए हैं। गु्रप की ओर से तीन साल में अब तक 800 से अधिक बार रक्तदान किया जा चुका है। इन सभी संगठनों से जुड़े लोग आपात स्थिति में तत्काल अस्पताल पहुंच कर रक्तदान करते हैं। रक्तदाताओं ने लॉकडाउन में शिविरों पर प्रतिबंध के बावजूद जिले में रक्त की कमी नहीं आने दी।
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कांच की बोतलों में होता था रक्तदान
गेस्ट राईटर
पदमेश गांधी, जिला संयोजक, रक्तदान अभियान
डूंगरपुर.
रक्तदान को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां थी। लोग मानते थे कि रक्तदान करने से कमजोरी आ जाती है और मर भी जाते हैं। मैंने पिताजी की मृत्यु के बाद पहली बार वर्ष १९७७ में रक्तदान किया। एक महिला बुरी तरह से झुलसी हालत में भर्ती हुई थी। उसकी स्थिति देखकर मेरा मन द्रवित हो उठा। उसकी हालत बहुत ज्यादा गंभीर थी, उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, फिर भी मैंने रक्तदान किया। दुर्भाग्य से महिला बच नहीं पाई, लेकिन रक्तदान करके मुझे सुकून मिला कि मैंने उसे बचाने का प्रयास किया। इसके बाद यह सिलसिला शुरू हो गया। पुराना अस्पताल परिसर में सामान्य चिकित्सालय संचालित था। ब्लड बैंक नहीं था, सिर्फ लेबोरेट्री थी। डा. राकेश वर्मा उसके प्रभारी थे। हरीश जोशी लेब टेक्नीशियन थे। कांच की बोतल में रक्तदान होता था तथा उस दौर में बिना किसी जांच के सीधे मरीज को खून चढ़ाया जाता था। उस वक्त गिने चुने लोग नि:शुल्क रक्तदान करते थे। रक्तदान करने से किसी की जान बच जाती थी तो परिवार के लोग रक्तदाता को बहुत ज्यादा सम्मान देते थे। मुझे याद है कि एक बार कानजी भाई नाई के परिवारजन के लिए रक्तदान करने पर वे मेरे लिए एक किलो घी लेकर आए थे। मैंने वह स्वीकार नहीं किया तथा पूरी विनम्रता से उन्हें इनकार कर दिया।
नगरपालिका के पास दो ठैलेवाले रहते थे वे 500-500 रुपए लेकर रक्तदान करते थे। उस समय ब्लड बेचना प्रतिबंधित नहीं था, इसलिए उन लोगों ने इसे धंधा बना लिया था। बाद में अस्पताल नए परिसर में शिफ्ट हो गया और वे लोग भी बाहर चले गए।
नि:शुल्क और स्वैच्छिक रक्तदान का सिलसिला धीरे-धीरे चलता रहा। कुछ अन्य लोगों को भी मोटिवेट करके रक्तदान कराया। डूंगरपुर में ब्लड बैंक स्वीकृत होने के बाद यह क्रम और बढ़ा। डा. राजेश सरैया के संपर्क में आने पर उन्होंने रक्तदान के प्रावधानों की जानकारी दी। जय अंबे पदयात्रा एवं मित्र संस्थान की स्थापना के बाद उसे रक्तदान मुहिम से जोड़ा। संस्थान का सदस्य बनने के लिए रक्तदाता होनेे की अनिवार्यता रखी गई। इससे कई नए रक्तदाता बने। रक्तदान को धर्म से जोड़ते हुए माताजी के कुमकुम का रंग लाल और रक्त भी लाल. . . की थीम अपनाते हुए लोगों को माता की भक्ति रक्तदान से करने के लिए प्रेरित किया। वर्ष २०११ में जिला प्रशासन, महावीर इंटरनेशनल और ब्लड बैंक के सांझे में जिला रक्तदान परिषद गठित की गई। इसके माध्यम से जिले भर में रक्तदान जागरूकता मुहिम चलाई गई। परिणाम स्वरुप जिले में रक्तदान का ग्राफ उत्तरोतर बढ़ता गया जो अब तक जारी है। वर्ष २०१२ में हार्ट का ऑपरेशन होने के बाद चिकित्सकों की सलाह से मैंने रक्तदान बंद कर दिया, तब तक ५६ बार रक्तदान किया। वहीं २५ हजार से अधिक लोगों को रक्तदान के लिए पे्ररित किया। आज रक्तदान के प्रति लोगों में बढ़ी जागरूकता को देखकर प्रसन्नता होती है। अभियान अभी रूका नहीं है यह निरंतर जारी रहेगा।

Harmesh Tailor Photographer
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