घर बैठे बैकिंग के दावे, ई-मनीऑर्डर के भी वांदे

घर बैठे बैकिंग के दावे, ई-मनीऑर्डर के भी वांदे

Vinay Sompura | Publish: Sep, 07 2018 11:59:00 PM (IST) Dungarpur, Rajasthan, India

- फ्री होते हैं, तो कम्प्यूटर में जनरेट हुए ईएमओ का कर आते हैं भुगतान
- स्टॉफ एवं इंटरनेट की समस्या बना बाधा
- समय पर नहीं मिल रही उपभोक्ताओं को राशि

घर बैठे बैकिंग के दावे, ई-मनीऑर्डर के भी वांदे
- फ्री होते हैं, तो कम्प्यूटर में जनरेट हुए ईएमओ का कर आते हैं भुगतान
- स्टॉफ एवं इंटरनेट की समस्या बना बाधा
- समय पर नहीं मिल रही उपभोक्ताओं को राशि

डूंगरपुर.
खुशी का पयाम, कहीं दर्द नाम लाने वाले हमारे भारतीय डाक विभाग के डाकिये प्रतिस्पद्र्धा के तकनीकी युग में समय के साथ कदमताल नहीं कर पा रहे हैं। मोबाइल बैकिंग और घर बैठे बैकिंग सुविधाएं मिलने के इस दौर में ई-मनीऑर्डर से भुगतान एक-एक पखवाड़े के बाद भी बमुश्किल ही मिल पा रहा है। जबकि, ई-मनीऑर्डर की सुविधा उसी दिन भुगतान के लिए शुरू की गई है।
एमओ से ई-एमओ किया, पर नहीं सुधरे हालात
भारतीय डाक विभाग ने 1880 से मनीऑर्डर सेवा शुरू की और यह सेवा देश के एक लाख 55 हजार से अधिक डाकखानों के माध्यम से आमजन को मिल रही थी। इससे बाहर रोजगाररत लोग सगे संबंधियों एवं परिचितों को नकदी पहुंचा पा रहे थे। लेकिन, इंटरनेट और मोबाइल के युग में इस सेवा को दम तोड़ते देख विभाग ने 10 अक्टूबर 2008 को इलेक्ट्रोनिक मनीऑर्डर की सेवा शुरू की। इससे दावा किया जा रहा था कि उपभोक्ताओं को उसी दिन नकदी मिलेगी। पर, यहां हालात अब भी नहीं सुधरे हैं।
यहां यह हैं हालात
डूंगरपुर में स्थितियां अलग हैं। हालात यह हैं कि डाकघर अधीक्षक कार्यालय में बाहर से आने वाले ई-एमओ जनरेट तक नहीं हो पा रहे हैं। स्टॉफ के टोटे के चलते कार्मिक रोजमर्रा के कामकाज से फ्री होने पर ही ऑनलाइन सर्वर से संपर्क स्थापित कर ई-एमओ देखते हैं तथा इसके बाद संबंधित व्यक्ति को भुगतान की कार्रवाई होती है। इस पूरी प्रक्रिया में 10 से 15 दिन तो कई बार और भी अधिक समय हो रहा है।
यह है ताजा मामला
अलवर के भारतभूषण अग्रवाल एवं पद्मचंद गोयल ने डूंगरपुर में रहने वाली अपनी बहन को रक्षाबंधन की भेंट स्वरुप 28 अगस्त 2018 को ई-एमओ से राशि भेजी। बहन बीना मनोज गांधी को कॉल पर इसकी सूचना भेजी। पर, काफी दिनों के बाद भी यह भेंट डाक विभाग के माध्यम से घर नहीं पहुंची। इस पर गांधी ने डाक विभाग से संपर्क किया, तो पहले तो सीधा-सपाट जवाब दे दिया कि आई ही नहीं है। आने पर भिजवा देंगे। लेकिन, थोड़ी पड़ताल की, तो बोले, देखते हैं। कम्प्यूटर स्टॉर्ट कर देखा, तो यह ई-एमओ बहुत दिन पहले ही आ गया था। गांधी ने बताया कि गत वर्ष भी ईएमओ किया था। पर, मिला ही नहीं।
डाक में ही गुजरता है दिन
विभागीय कार्मिकों ने बताया कि स्टॉफ की कमी है। ऐसे में रोजाना बाहर से आने वाली डाकों को ऑनलाइन जनरेट करने के कार्य में ंही दिन गुजर जाता है। ऐसे में ई-एमओ वाला कार्य समय पर नहीं हो पाता। कोशिश करते हैं कि सात से 10 दिन में भुगतान हो जाए। नियमित बाहर से आने वाले ई-एमओ औसतन सात से 10 होते हैं। जबकि, डाक प्रतिदिन औसतन एक हजार होती है। सूत्र बताते हैं कि जिला मुख्यालय पर तो और भी ईएमओ देने के प्रयास करते हैं। पर, ग्रामीण अंचल में हालात और भी अधिक खराब है। यहां तो स्टॉफ, नेटवर्क आदि कई तरह की समस्याएं हैं।
न्यूज इंफो...
. डाकघर अधीक्षक कार्यालय अंतर्गत 19 शाखा ब्रांच का है जिम्मा
. कार्यालय में डाकियों की पांच में से दो पद लम्बे समय से हैं रिक्त
- कनिष्ठ लिपिक के 23 पदों में से 05 ही कार्यरत है। १० कार्मिक शाखा कार्यालयों में प्रतिनियुक्ति पर है।
- हर माह डूंगरपुर में पांच से छह हजार ई-एमओ होते है जारी
. ई-एमओ पर प्रति 20 रुपए एक रुपए लगता है शुल्क
. शहर को कुछ वर्षों पूर्व तक 11 जोन में बांट रखा था। अब महज ०५ जोन

अधिकारी ने कहा..
. सर्वर और स्टॉफ की परेशानी है। डाक से फ्री होने पर ही ईएमओ का कार्य कर पाते हैं। कभी कोई अर्जेंट हो तो निकाल भी देते हैं। हालांकि, देरी में कई बार गलत पिन-कोड नम्बर डालना भी वजह बनता है। हालांकि, पेंशन से जुड़े मनीऑर्डर को वरीयता देते हैं।
- मणिलाल कटारा, मुख्य डाकपाल, डाकघर अधीक्षक कार्यालय

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