डूंगरपुर : क्रिकेट की मार, हमारे परम्परागत खेल हो गए बाउंड्री से बाहर

मकर संक्रांति पर पहले खेले जाते थे कई परम्परागत खेल

By: Ashish vajpayee

Published: 13 Jan 2018, 10:38 PM IST

देवराम मेहता. डूंगरपुर. आसपुर. कडाके की सर्दी के दौर में तिलपट्टी, गजक एवं गुडधाणी के साथ गांवों की लोक संस्कृति में शुमार रहे परम्परागत खेल अब लुप्त होते जा रहे हंै। यहा जिक्र मकर संक्रान्ति के साथ ही शुरू होने वाले गिल्ली डंडा, गिडा डोट, सतोलिया, बित्तू एवं रूमाल झपट आदि परम्परागत खेलों का है। अब यह खेल क्रिकेट के बेट से बॉल की तरह बाउन्ड्री के बाहर होते जा रहे है। जिन हाथों में कभी गिल्ली डंडा व गिडा डोट रही।

वहीं इन हाथों में अब क्रिकेट की बॉल व बल्ला आ गया है। गांवों के सभी खेल मैदानों पर क्रिकेट का कब्जा हो गया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिवार्षिक खेलकूद प्रतियोगिताओं में भी क्रिकेट हावी हो गया है। कुछ संगठनों ने वॉलीबाल व कबड्डी को जरूर आबाद रखा है परन्तु शेष खेल अब हांसिये पर है। हमारे अतीत को टटोलकर देखें तो शीातकाल में परम्परागत खेलों की धूम मची रहती थी। घर परिवार के दायित्वों का निर्वहन करते हुए हर आयु वर्ग के लोगों की न केवल इन खेलों के प्रति रूचि रही अपितु खेल को बढावा देने का उपक्रम भी चलता रहता था।

अब तो प्रतीकात्मक तौर पर केवल मकर सक्रान्ति पर ही कुछ गांवों में गिडाडोट, गिल्ली डंडा आदि परम्परागत खेलों का प्रचलन रह गया है वहीं आसमान की ऊंचाई पर तैरती रंग बिरंगी पतंगे जरूर हमारी संस्कृति के रंगों को सजाती है। पूरा युवा वर्ग क्रिकेट में इस कदर खोकर रह गया है कि अपनी पढाई से भी अधिक क्रिकेट के प्रति दीवानगी का माहौल है। परम्परागत खेलों के प्रति इनकी आस्था भी नही रही है।

देशी खेलों का हो संरक्षण

लोक संस्कृति, संस्कार एवं श्रेष्ठ परम्पराओं के माहौल की सलामती युवा शक्ति में उमडती चक्रवाती उर्जा पर निर्भर है वहीं देशी खेल परम्पराओं को प्रवाहमान व पहचान को कायम रखने समाज की पुरानी एवं नई पीढ़ी में तालमेल भी जरूरी है। परम्परागत खेलों को मैदान से खदेडने में कहीं न कहीं इस तालमेल की कमी भी रही है।

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