औसत से कम मेहर, भारी पड़ेगी मानसून की बेरुखी
डूंगरपुर. दक्षिणी राजस्थान का डूंगरपुर जिला। गत कुछ वर्ष से मानसून की मेहर से खुश था। लेकिन, इस वर्ष मानसून सुस्त-सुस्त अंदाज में ही रहा है। स्थितियां यह रही है कि गत वर्ष की औसत वर्षा की तुलना में काफी कम वर्षा हो पाई है। जिले के कुछ क्षेत्र तो ऐसे भी रहे हैं, जो पूरे मानसून सत्र के गुजर जाने के बावजूद एक भी अच्छी वर्षा देख नहीं पाए हैं। ऐसे में स्थितियां यह है कि जिले के अधिकांश बांध, तालाब, नदिया सूखी पड़ी है। ऐसे में आने वाले वर्ष में ग्रीष्म ऋतु में पेयजल की स्थिति काफी विकट रहने की पूरी संभावना बन गई है।
२२ में से महज आठ भरे
सिंचाई विभाग के अंतर्गत 22 प्रमुख बांधों में से महज आठ ही भरे हैं। जिले के सबसे बड़े सोमकमला आम्बा बांध में 172.50 एमसीएफटी के मुकाबले फिलहाल 169.04 पानी ही है। स्थितियां यह है कि जिले के आठ भरे हुए जलाशयों को छोड़ शेष बचे जलाशयों में अधिकांश जलाशय अपने पैंदा दिखा रहे हैं। ऐसे में सिंचाई से जुड़े हुए यह बांध गर्मियों के समय में काश्तकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाएंगे। इससे इस सत्र एवं आने वाले सत्र की फसलों के उत्पादन पर असर पडऩा तय है।
काश्तकारों की बढ़ी चिंता
रामसौर. वागड़ में मानसून की राह देखने देखने में पूरा सावन बीत गया। पर, जलाशयों का पैंदा सूखा ही पड़ा है। मानसून की बेरुखी ने लोगों के माथे पर सलवटें बढ़ा दी हैं। गलियाकोट उपखण्ड क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों के कई जल स्त्रोत खाली हैं। बाबा की बार बांध सहित जसैला तालाब, पारड़ा विष्णुजी, लिंबडिया तालाब सहित क्षेत्र का सबसे बड़ा उपैयावाला तालाब खाली पड़ा है। ऐसे में किसानों को धान के साथ साथ रबी की फसल की भी चिंता सताने लग गई हैं। खास कर मवेशियों के लिए पानी का प्रबंध चिंता का विषय बन रहा है। नादिया गांव के हरिशंकर पाटीदार ने बताया कि उपैयावाला तालाब पर ही क्षेत्र के कुंओं, खेती एवं भू-जल स्तर निर्भर है। यह तालाब भरा करीब तीन सावन हो गए। इस तालाब से नादिया सहित क्षेत्र का उपैया, बार वैजणिया, खेड़ासा सहित कई अन्य आसपास के गांवों की तकरीबन 600 से 700 बिघा भूमि पर सिंचाई प्रभावित होती है। जसैला के अरविंद पाटीदार बताते है कि जैसला तालाब के भी कमोबेश यहीं हाल है। इससे गांव सहित आसपास के गांवों की करीब दो सौ बिघा भूमि पर धान की फसल लहराती है।
सूखे तालाब
सरोदा. गांव सहित आसपास के गांवों पादरड़ी बड़ी, पादरड़ी छोटी, वमासा, करियाणा, सामलिया, पारड़ा सरोदा, कराड़ा, बुचिया बड़ा, गड़ाझुमजी, सामलिया, नयागांव, वरसिंगपुर सहित लगभग दर्जन भर गांवों के जलाशय सूखे पड़े हैं। तालाबों का पैंदा दिख रहा है। जबकि इन दिनों में लगभग जलाशय लबालब भरे रहते हैं।
रीते हैं जलाशय
सागवाड़ा. क्षेत्र के अधिकांश जलाशयों में पानी की आवक नहीं होने से सूखे हैं। शहर का सबसे प्राचीन लोहारिया तालाब आधा भी नहीं भर पाया है। जलाशय की ख्याति तथा धार्मिक महत्व के कारण इसके किनारे कई मंदिर तथा घाट बने हुए हैं। तालाब में पानी की आवक पर ही अन्य ग्रामीण जलाशयों के साथ शहर के जलस्त्रोत निर्भर करते हैं। वर्तमान में तालब की रपट से पानी काफी दूर है तथा मानसून का अन्तिम दौर है। हालांकि, तालाब में पानी की आवक का कम होना पहाड़ी क्षेत्रों में एनिकट का बनना तथा तालाब के किनारे गलत तकनीक से बनाई गई माही नहर को भी बताया जा रहा है। मसानिया तालाब भी इस साल पानी को तरस गया है। सासरिया तालाब भी खाली पड़ा है। गोवाड़ी तालाब में पानी के आवक मार्ग पर अतिक्रमण की भरमार होने से पूरा खाली है। वरसिंगपुर तालाब को मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन में लिया गया था। पर, कम बारिश के चलते रिता पड़ा है। वरसिंगपुर के निकट तेजोर तालाब में भी पानी की आवक कम होने से पूरा नहीं भर पाया है। आंतरी क्षेत्र में अच्छी बारिश के चलते लोडिसर बांध तथा टामटिया का भई बांध भर गया है।
वात्रक रहा सूखा
सीमलवाड़ा. कस्बे के पाडलिया गांव में स्थित सबसे बड़ा तालाब से दो नहरें जुड़ी है। इस तालाब पर करीब 14 से 15 गांवों की सिंचाई निर्भर है। पर, आंचल सूखा है। पानी नहीं होने से फसले सूख रही है। रबी की फसल में चार बार पानी मिलता था। इस तालाब में पानी नहीं होने से पाडलिया गांव के किसानों के कुंओं का भी जल स्तर गिर गया है। वहीं, पीने के पानी का जल मिलना भी मुश्किल लग रहा है।
चीतरी. गलियाकोट क्षेत्र के भी कई जलाशय खाली है। मानसून के सक्रिय होने पर इस वर्ष लग रहा था कि अच्छी बारिश होगी। लेकिन, इसके बाद मानसून सुस्त पड़ गया है। धान की फसल मृत प्राय: पड़ी है। चीतरी, नादिया, गड़ा मेडतिया, बाबा की बार, भेमई, झौसावा, घाटा का गांव तथा जोगपुर सहित क्षेत्र के बड़े तथा छोटे जलाशय खाली हंैं। क्षेत्र के प्रमुख बाबा की बार जलाशय पर गत वर्ष चादर चली थी। लेकिन, इस वर्ष तालाब में आधा पानी भी नहीं है। अपर्याप्त बारिश से कृषकों के चहरे उतर गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए भी समस्या नजर आ रही है।

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