गरीब किसान की 3 बेटियों ने किया गजब का काम, तीनों ही सेना में लेफ्टिनेंट पद हुई भर्ती

गरीब किसान की 3 बेटियों ने किया गजब का काम, तीनों ही सेना में लेफ्टिनेंट पद हुई भर्ती

Anil Kumar Jangid | Publish: Mar, 09 2018 11:52:47 AM (IST) दुनिया अजब गजब

इन तीनों बेटियों को आर्मी मेडिकल में भर्ती होने के बाद अलग-अलग जगह नियुक्ति मिली है।

प्रचीन समय से लेकर आज तक बेटी किसी भी मुकाम पर बेटों से कमतर नहीं रही है चाहे हालात कैसे भी हों। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में एक गरीब किसान की तीन बेटियां है जो अपने दम पर सबके लिए प्ररेणा बन चुकी है। रोहतक के रहने वाले किसान प्रताप सिंह के तीन बेटियां है और ये तीनों ही सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर भर्ती हुई है। इन तीनों बेटियों ने प्रत्येक चुनौति का सामना करते हुए यह कठिन मुकाम हासिल किया है।


खेती कर बेटियों को पढ़ाया
इनमें से प्रताप सिंह की दो सगी बेटियां है और एक कजन सिस्टर है। उनके माता-पिता को अपनी बेटियों की इस उपलब्धि पर गर्व है। प्रताप सिंह किसान मूल रूप से झज्जर के रहने वाले हैं। उन्होंने खेती करके ही अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखा कर इस मुकाम पर पहुंचाया है। इन बहादुर बेटियों को आर्मी मेडिकल में भर्ती होने के बाद अलग-अलग जगह नियुक्ति मिली है। इनमें से एक बेटी को तमिलनाडू के वैलिंगटन में, दूसरी को यूपी के आगरा में और तीसरी को उत्तराखंड के रानीखेत में नियुक्ति दी गई है।

 

गजब का है ये भारतीय दिव्यांग तीरंदाज ! दांतों से तीर चलाकर जीत चुका है कई मेडल

यह कहावत अभिषेक थावरे पर खरी उतरती है की मेहनत और लगन के बल कुछ भी हासिल किया जा सकता है। इस लाइन पर खरे उतरने वाले अभिषेक भारत के पहले ऐसे तीरंदाज हैं जो हाथों की बजाए दांतों से तीर चलाते हैं। अभिषेक पोलियोग्रस्त हैं और इसका उन्हें तक चला जब उन्होंने होश संभाला। लेकिन अभिषेक ने पोलियो से हार नहीं मानी और 8वीं क्लास में पढ़ते हुए एथलेटिक्स में हिस्सा लेने लगे। उनकी मेहनत और लगन रंग लाई जिसके बूते पर वो इंटर स्कूल नेशनल लेवल के एथलीट बन गए। अभिषेक स्कूल अपने स्कूल के समय में ही 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर की रेस में कई मेडल जीत चुके हैं। सबकुछ अच्छा चलते हुक अभिषेक की किस्मत ने 26 अक्टूबर 2010 को एकबार फिर धोखा दिया। क्योंकि उन्हें एक "नी-इन्जरी'' हो गई जिसके बाद उनके जीवन में ठहराव आ गया। इसके बाद अभिषेक लगातार 2 साल तक परेशान रहे और लगभग निराश हो चुके थे। लेकिन उसके बाद संदीप गवई ने उन्हें प्रेरणा दी और फिर से उन्होंने आगे बढ़ने का मन बनाया।

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